विस्तृत उत्तर
मैना के विलाप और नारदजी के समझाने के बाद शिवजी ने अपना अत्यन्त सुन्दर और मनोहर रूप धारण किया। बालकाण्ड में इसका वर्णन है कि जगज्जननी पार्वतीजी की शोभा का वर्णन करोड़ों मुखोंसे भी करते नहीं बनता, और सुन्दरता-शोभा की खान माता भवानी मण्डपके बीचमें, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गयीं।
विवाह मण्डप में शिवजी का रूप अत्यन्त सुन्दर था। चौपाई में कहा — 'पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा। बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥'
अर्थ — जब महेश्वर (शिवजी) ने पार्वतीका पाणिग्रहण किया, तब सब देवता हृदयमें बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजीका जय-जयकार करने लगे।
इस प्रकार शिवजी ने विवाह मण्डप में दिव्य और सुन्दर रूप धारण किया जो सबको मोहित कर गया।





