विस्तृत उत्तर
सीताजी और श्रीरामजी के प्रथम दर्शन में तुलसीदासजी ने श्रृंगार रस का अत्यन्त मधुर और पवित्र वर्णन किया।
रामजी की ओर से — 'सिय मुख ससि भए नयन चकोरा' — सीताजी के मुखरूपी चन्द्रमा के लिये रामजी के नेत्र चकोर बन गये। 'देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा' — सीताजी की शोभा देखकर सुख पाया, हृदय में सराहना करते हैं पर मुख से बचन नहीं निकलता।
सीताजी की ओर से — 'सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत' — पवित्र प्रीति जागी। 'चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत' — भयभीत मृगछौनी की तरह चारों ओर देखती रहीं।
यह श्रृंगार रस का संयोग पक्ष है — दोनों ने एक दूसरे को पहली बार देखा, प्रेम जागा, पर लोक-लाज और मर्यादा के कारण प्रकट नहीं किया। यह रामचरितमानस का सबसे मधुर प्रसंग माना जाता है।





