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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

सीताजी और श्रीरामजी के प्रथम दर्शन में तुलसीदासजी ने

श्रृंगार रस (संयोग पक्ष) — रामजी के नेत्र सीता-मुख के चकोर बने, सीताजी में पवित्र प्रीति जागी पर मृगछौनी-सी भयभीत।

संक्षिप्त उत्तर

श्रृंगार रस (संयोग पक्ष) — रामजी के नेत्र सीता-मुख के चकोर बने, सीताजी में पवित्र प्रीति जागी पर मृगछौनी-सी भयभीत। दोनों ने प्रेम अनुभव किया पर लोकलाज-मर्यादा से प्रकट नहीं किया। मानस का सबसे मधुर प्रसंग।

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विस्तृत उत्तर

सीताजी और श्रीरामजी के प्रथम दर्शन में तुलसीदासजी ने श्रृंगार रस का अत्यन्त मधुर और पवित्र वर्णन किया।

रामजी की ओर से — 'सिय मुख ससि भए नयन चकोरा' — सीताजी के मुखरूपी चन्द्रमा के लिये रामजी के नेत्र चकोर बन गये। 'देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा' — सीताजी की शोभा देखकर सुख पाया, हृदय में सराहना करते हैं पर मुख से बचन नहीं निकलता।

सीताजी की ओर से — 'सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत' — पवित्र प्रीति जागी। 'चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत' — भयभीत मृगछौनी की तरह चारों ओर देखती रहीं।

यह श्रृंगार रस का संयोग पक्ष है — दोनों ने एक दूसरे को पहली बार देखा, प्रेम जागा, पर लोक-लाज और मर्यादा के कारण प्रकट नहीं किया। यह रामचरितमानस का सबसे मधुर प्रसंग माना जाता है।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

सीताजी और श्रीरामजी के प्रथम दर्शन में तुलसीदासजी ने कौन सा रस वर्णित किया को संदर्भ सहित समझें

सीताजी और श्रीरामजी के प्रथम दर्शन में तुलसीदासजी ने कौन सा रस वर्णित किया का सबसे सीधा सार यह है: श्रृंगार रस (संयोग पक्ष) — रामजी के नेत्र सीता-मुख के चकोर बने, सीताजी में पवित्र प्रीति जागी पर मृगछौनी-सी भयभीत। दोनों ने प्रेम अनुभव किया पर लोकलाज-मर्यादा से...

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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