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विस्तृत उत्तर
सूतक काल में दान, जप और हवन वर्जित बताए गए हैं। गरुड़ पुराण में इस अवधि में दैनिक संध्या-वंदन, दान, जप, हवन, वेदों का स्वाध्याय, देव-तर्पण, व्रत और ब्राह्मण-भोजन को वर्जित बताया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि परिजन सांसारिक और अन्य धार्मिक क्रियाओं से विरत होकर पूर्णतः प्रेत की सद्गति और पारलौकिक देह-निर्माण पर ध्यान दें।
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