विस्तृत उत्तर
विशिष्टाद्वैत में मोक्ष 'ज्ञान' मात्र से नहीं, बल्कि भगवान नारायण के प्रति अनन्य प्रेम, 'भक्ति' और 'प्रपत्ति' (पूर्ण समर्पण) के माध्यम से प्राप्त होता है।
विशिष्टाद्वैत में मुक्ति के बाद जीव भगवान में पूर्ण रूप से विलीन होकर अपना अस्तित्व समाप्त नहीं करता, बल्कि वह वैकुंठ में भगवान के साथ शाश्वत आनंदमय संबंध में रहता है।
यद्यपि दार्शनिक स्तर पर अद्वैत और विशिष्टाद्वैत में भेद प्रतीत होता है, किंतु उच्च आध्यात्मिक चेतना में द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत एक ही सत्य की विभिन्न अनुभूतियाँ मानी जाती हैं।





