विस्तृत उत्तर
धुंधुकारी के मुक्त होने पर वैकुंठवासी पार्षदों सहित एक विमान आया और वह सबके सामने उस पर चढ़ गया। गोकर्ण ने पूछा कि वहाँ बहुत से शुद्ध श्रोता थे, फिर सबके लिये विमान क्यों नहीं आए। पार्षदों ने बताया कि फल का भेद श्रवण के भेद से हुआ। धुंधुकारी ने सात दिन निराहार रहकर श्रवण किया और स्थिर चित्त से मनन-निदिध्यासन किया। उन्होंने कहा कि गुरु वचन में विश्वास, दीनता, मन के दोषों पर विजय और कथा में निश्चल मन हो तो श्रवण का यथार्थ फल मिलता है। यदि वे श्रोता फिर से श्रीमद्भागवत कथा सुनें, तो वे भी निश्चित वैकुंठ में निवास करेंगे। इस प्रकार वैकुंठ कथा-श्रवण के साथ सही मनन और आचरण से जुड़ा है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





