विस्तृत उत्तर
यज्ञ रक्षा सफलतापूर्वक सम्पन्न होने पर विश्वामित्रजी अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने श्रीरामजी को 'ब्रह्मण्यदेव' (ब्राह्मणों का भगवान) जाना।
चौपाई — 'स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई। प्रभु ब्रह्मण्यदेव मैं जाना। मोहि निति पिता तजेउ भगवाना॥'
अर्थ — श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई परम सुन्दर हैं। विश्वामित्रजीको महान् निधि प्राप्त हो गयी। (वे सोचने लगे —) मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव (ब्राह्मणोंके भक्त) हैं। मेरे लिये भगवानूने अपने पिताको भी छोड़ दिया।
इसके बाद विश्वामित्रजी श्रीराम-लक्ष्मण को लेकर जनकपुर (मिथिला) की ओर चले — जहाँ धनुष-यज्ञ होने वाला था।





