दिव्यास्त्रश्रीराम को वायव्यास्त्र कैसे मिला?श्रीराम को वायव्यास्त्र उनके गुरु महर्षि विश्वामित्र ने दिया था जब वे यज्ञ रक्षा के लिए उन्हें वन ले गए थे।#श्रीराम#वायव्यास्त्र#विश्वामित्र
ग्रह उपायगुरु ग्रह मजबूत करने के गुरुवार उपाय?विष्णु-लक्ष्मी पूजा, केला वृक्ष पूजा, 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः' 108, हल्दी/चना/पीला/पुस्तक दान, गुरुवार व्रत, पुखराज(ज्योतिषी), पीले वस्त्र। ज्ञान बांटें+दान=गुरु प्रसन्न।#गुरु#बृहस्पति#गुरुवार
आधुनिक धर्मऑनलाइन गुरु से दीक्षा लेना सही है क्या?आदर्श नहीं, पर विकल्प। दीक्षा=व्यक्तिगत(ऊर्जा/स्पर्श=ऑनलाइन असंभव)। ऑनलाइन शिक्षा/मार्गदर्शन=स्वीकार्य। ⚠️ नकली/ठगी खतरा। औपचारिक दीक्षा=सशरीर। धीरज रखें।#ऑनलाइन#गुरु#दीक्षा
तंत्र शास्त्रतांत्रिक साधना में गुरु का होना क्यों अनिवार्य है?कुलार्णव: 'गुरु बिना मंत्र नहीं।' कारण: मंत्र चैतन्य (गुरु जागृत करें), सूक्ष्म विधि (भूल=गंभीर), शक्ति हस्तांतरण (परंपरा), सुरक्षा कवच (उग्र शक्तियां), अनुभव (ग्रंथ≠अनुभव)। गुरु गीता: 'गु=अंधकार, रु=प्रकाश।'#गुरु#अनिवार्य#तंत्र
आध्यात्मिक साधनाआध्यात्मिक अनुभवों को दूसरों से साझा करना चाहिए या नहीं?सामान्य: गोपनीय रखें। कारण: अहंकार↑, शक्ति क्षय (बीज खोलें=सूखे), उपहास/ईर्ष्या। किसे बताएँ: गुरु=अवश्य, सहसाधक=सीमित, परिवार=सावधानी। अपवाद: गुरु कहें, दूसरों को मार्गदर्शन (विनम्रता से)। कबीर: 'बोलना कहाँ बुद्धिमानी, बोले वहाँ हानि।'#अनुभव गोपनीयता#साझा करना#गुरु
दिव्यास्त्रश्रीराम को आग्नेयास्त्र कैसे मिला?श्रीराम को आग्नेयास्त्र उनके गुरु महर्षि विश्वामित्र से मिला था जो उन्हें राक्षसों से यज्ञ की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए दिया गया था।#श्रीराम#आग्नेयास्त्र#विश्वामित्र
मंत्र जप ज्ञानमंत्र जप में पुस्तक से सीखकर जप करना उचित है या गुरु से सीखें?गुरु > पुस्तक (शक्ति transfer, उच्चारण, मार्गदर्शन)। किन्तु: 'ॐ नमः शिवाय'/गायत्री = दीक्षा अनिवार्य नहीं। बीज/तांत्रिक = गुरु अनिवार्य। 'गुरु न मिले = शुरू करें — ईश्वर = गुरु।'#पुस्तक#गुरु#सीखना
शिव रूपदक्षिणामूर्ति शिव की उपासना का क्या महत्व है?दक्षिणामूर्ति = शिव का परम गुरु स्वरूप। दक्षिणामूर्ति उपनिषद् (यजुर्वेद): 24 अक्षर मंत्र। शंकराचार्य स्तोत्र: अद्वैत सार, 'मोक्ष शास्त्र'। मौन गुरु — वृद्ध शिष्यों के संशय छिन्न। गुरु न मिले तो इन्हें गुरु मानें। गुरुवार/गुरु पूर्णिमा विशेष। विद्यार्थियों के लिए बुद्धि वृद्धि।#दक्षिणामूर्ति#गुरु#ज्ञान
मंत्र विधिमंत्र जप में गुरु का मार्गदर्शन कैसे लें?गुरु = सबसे महत्वपूर्ण। पहचान: शास्त्र+अनुभव, निःस्वार्थ, परंपरा, शुद्ध आचरण। कैसे: दीक्षा, नियमित संपर्क, प्रश्न, आज्ञा पालन, सेवा। न मिले: सद्ग्रंथ=गुरु, नाम जप, ईश्वर से प्रार्थना।#गुरु#मार्गदर्शन#शिष्य
गुरु परंपराआधुनिक युग में गुरु कैसे ढूंढें?गीता(4.34): ज्ञानियों के पास जाओ, प्रणाम+प्रश्न+सेवा करो। शास्त्र पहले पढ़ें, सत्संग जाएँ, कई गुरु सुनें, शास्त्र+आचरण परखें। 'शिष्य तैयार=गुरु मिलते हैं।'#गुरु#ढूंढना#आधुनिक
दिव्यास्त्रदिव्यास्त्र प्राप्त करने के क्या तरीके थे?दिव्यास्त्र तीन तरीकों से मिलते थे — देवताओं की कठोर तपस्या, देवताओं से सीधा वरदान, या द्रोणाचार्य जैसे गुरु से शिक्षा।#दिव्यास्त्र#प्राप्ति#तपस्या
गुरु भक्तिदत्तात्रेय मंत्र का जप गुरु कृपा के लिए कैसे करें?दत्तात्रेय = त्रिमूर्ति अवतार, आदि गुरु। 'ॐ दत्तात्रेयाय नमः' 108। गुरुवार, दत्त जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा)। रुद्राक्ष, औदुंबर (गूलर) वृक्ष नीचे। 24 गुरु (प्रकृति)। गुरु कृपा/ज्ञान/मार्गदर्शन। महाराष्ट्र/कर्नाटक प्रचलित।#दत्तात्रेय#गुरु#त्रिमूर्ति
तंत्र साधनातंत्र में शक्तिपात के समय क्या अनुभव होता है?गुरु → शिष्य ऊर्जा transfer। कंपन/गर्मी-ठंडक/विद्युत, रोना/हंसना/आनंद, प्रकाश/देवता दर्शन, नाद, शून्यता। स्पर्श/दृष्टि/मंत्र से। काश्मीर शैव: तीव्र/मध्यम/मंद। अनुभव व्यक्तिगत।#शक्तिपात#अनुभव#गुरु
तंत्र शास्त्रतंत्र विद्या सीखने के लिए कहाँ जाएं?गुरु से ही — इंटरनेट/पुस्तक नहीं। कहाँ: सिद्ध गुरु (सर्वोत्तम), शाक्त मठ (कामाख्या/तारापीठ/काशी), संस्कृत विश्वविद्यालय। सावधानी: 90% ठग, धन मांगने वाले=संदेहास्पद, YouTube तांत्रिक=खतरनाक। पहले भक्ति दृढ़ करें → गुरु स्वयं मिलेगा।#सीखना#कहाँ#गुरु
दक्षिणामूर्ति साधनाक्या शिव जी को गुरु मान सकते हैं?हाँ, मानव गुरु न मिलने पर भगवान दक्षिणामूर्ति को ही अपना गुरु मानकर साधना की जा सकती है।#गुरु#दक्षिणामूर्ति#आदि गुरु
दक्षिणामूर्ति साधनामौन-व्याख्यान क्या होता है?बिना शब्दों के केवल मौन के माध्यम से संशयों को दूर करना ही मौन-व्याख्यान कहलाता है।#मौन-व्याख्यान#गुरु#ज्ञान पद्धति
पाशुपत अस्त्र साधनापाशुपत साधना में गुरु-दीक्षा क्यों अनिवार्य है?मंत्र की सटीक विधि और तीव्र ऊर्जा को नियंत्रित करने के लिए गुरु-दीक्षा अनिवार्य है।#गुरु#दीक्षा#अनिवार्यता
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी ने धनुष तोड़ने से पहले किसको प्रणाम किया?गुरु विश्वामित्रजी के चरणकमलों को मन में प्रणाम किया, साथ ही गुरुजनों, माता-पिता और शिवजी को। फिर सहज भाव से धनुष उठाया। सर्वशक्तिमान होकर भी विनम्रता — मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श।#बालकाण्ड#राम प्रणाम#गुरु
योग निर्माणनल योग में बुध और गुरु (बृहस्पति) ग्रहों का क्या रोल होता है?जिन 4 राशियों में नल योग बनता है, उनके मालिक सिर्फ बुध और गुरु होते हैं। इसलिए इस योग में क्रूर ग्रहों का गुस्सा भी समझदारी और ज्ञान में बदल जाता है।#बुध#गुरु#बौद्धिक ग्रह
योग भंगनल योग में शारीरिक दोष (बीमारी) को कौन सा ग्रह खत्म करता है?अगर देवगुरु बृहस्पति (Jupiter) बहुत मजबूत होकर लग्न या चंद्रमा को देख ले, या खुद लग्न में बैठा हो, तो वह अपनी शुभ दृष्टि से शरीर की हर बीमारी और विकृति को खत्म कर देता है।#गुरु#दोष भंग#शारीरिक विकृति
जप नियमजप माला में सुमेरु का क्या महत्व है और इसे क्यों नहीं पार करतेसुमेरु परमात्मा और गुरु का प्रतीक है। इसे न लांघना आध्यात्मिक अनुशासन और भक्ति की मर्यादा का हिस्सा है।#सुमेरु#माला#गुरु
राशि अनुसार उपायमीन राशि सबसे प्रभावी मंत्रमीन=गुरु। 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः', विष्णु सहस्रनाम। पुखराज, पीला, गुरुवार। भक्ति/ध्यान/सेवा=सबसे उपयुक्त।#मीन#गुरु#मंत्र
राशि अनुसार उपायधनु राशि गुरु कैसे मजबूत करेंधनु=गुरु। विष्णु+'ॐ बृं बृहस्पतये नमः'+गुरुवार+पीला दान+पुखराज। गीता पाठ+गुरु सम्मान+धर्म। Q895।#धनु#गुरु#मजबूत
तंत्र शास्त्रतंत्र शास्त्र में दीक्षा कितने प्रकार की होती है?प्रमुख: (1) क्रिया (बाह्य — होम/अभिषेक)। (2) चाक्षुषी (दृष्टि)। (3) स्पर्श (हाथ/मस्तक)। (4) शब्द/मंत्र (कान में — सर्वाधिक प्रचलित)। (5) ध्यान/मानसिक (सर्वसूक्ष्म)। (6) शक्तिपात (शक्ति प्रेषण — सर्वशक्तिमान)। (7) स्वप्न (दुर्लभ)। तंत्रसार: 'ज्ञान दे, पाप क्षीण करे = दीक्षा।'#दीक्षा#प्रकार#तंत्र
ज्योतिष दोष एवं उपायगुरु ग्रह कमजोर हो तो उपायविष्णु पूजा, 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः', गुरुवार व्रत, पीला दान (हल्दी/केला), पुखराज, गुरु सम्मान, दान+धर्म।#गुरु#बृहस्पति#कमजोर
पर्वगुरु पूर्णिमा पर गुरु दक्षिणा में क्या देनी चाहिएगुरु दक्षिणा: यथाशक्ति धन (₹101/501/1001), वस्त्र, फल-मिठाई, पुस्तकें, गौदान, स्वर्ण। सर्वोत्तम = गुरु सेवा + आज्ञा पालन + शिक्षा अभ्यास। 'विना दक्षिणा विद्या निष्फल'। राशि गौण, कृतज्ञता प्रधान।#गुरु पूर्णिमा#दक्षिणा#गुरु
पर्वगुरु पूर्णिमा पर व्यास पूजा का क्या विधान हैव्यास पूजा: आषाढ़ पूर्णिमा। व्यास पीठ → चित्र/पादुका स्थापित → गणपति पूजन → व्यास पूजन → गुरु परम्परा (ब्रह्मा से गुरु तक) → 'गुरुर्ब्रह्मा...' मंत्र → गुरु गीता पाठ → दक्षिणा। व्यास = वेद विभाजक, आदि गुरु। चातुर्मास साधना आरम्भ।#गुरु पूर्णिमा#व्यास पूजा#वेदव्यास
पर्वगुरु पूर्णिमा पर गुरु पूजा कैसे करेंगुरु पूर्णिमा: आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा = व्यास जन्मदिन। गुरु/व्यास पादुका पूजा → 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः...' जप → गुरु गीता पाठ → चरण स्पर्श → दक्षिणा → विद्वान भोजन। गुरु = ब्रह्मा-विष्णु-शिव स्वरूप।#गुरु पूर्णिमा#व्यास पूजा#गुरु
ग्रह मंत्रगुरु बृहस्पति गायत्री मंत्र का जप कैसे करें?'ॐ वृषभध्वजाय विद्महे...तन्नो गुरुः प्रचोदयात्'। बीज: 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः' 19,000। गुरुवार, पीले वस्त्र, पुखराज/तुलसी। गुरु = ज्ञान/धर्म/विवाह/भाग्य। + विष्णु पूजा।#गुरु#बृहस्पति#गायत्री
आध्यात्मिक साधनाआध्यात्मिक अनुभवों को दूसरों से साझा करना चाहिए या नहीं?सामान्य: गोपनीय रखें। कारण: अहंकार↑, शक्ति क्षय (बीज खोलें=सूखे), उपहास/ईर्ष्या। किसे बताएँ: गुरु=अवश्य, सहसाधक=सीमित, परिवार=सावधानी। अपवाद: गुरु कहें, दूसरों को मार्गदर्शन (विनम्रता से)। कबीर: 'बोलना कहाँ बुद्धिमानी, बोले वहाँ हानि।'#अनुभव गोपनीयता#साझा करना#गुरु
कुंडलिनी योगकुंडलिनी जागरण में गुरु का मार्गदर्शन क्यों आवश्यक है?अनिवार्य: सुरक्षा (शक्तिशाली ऊर्जा), शक्तिपात=सबसे सुरक्षित, भ्रम vs दिव्य=गुरु बताए, साधना समायोजन, अहंकार नियंत्रण। शिव संहिता: 'गुरु कृपा से कुंडलिनी।' बिना=सिंड्रोम/अस्थिरता/पतन।#गुरु#शक्तिपात#मार्गदर्शन
मंत्र सिद्धिमंत्र सिद्धि में गुरु की क्या भूमिका होती है?कुलार्णव: बिना दीक्षा मंत्र = मृत शिशु। गुरु की पाँच भूमिकाएं: मंत्र-चयन, दीक्षा (शक्तिपात), सही उच्चारण, साधना-मार्गदर्शन, शक्ति-संचरण। तीन प्रकार: शिक्षा, दीक्षा, और निष्पत्ति गुरु। जब साधक तैयार होता है — गुरु स्वयं प्रकट होते हैं।#गुरु#दीक्षा#गुरु-शिष्य
बीज मंत्रबीज मंत्र सिद्धि कैसे प्राप्त करें?कुलार्णव: बिना दीक्षा सिद्धि नहीं। पाँच शर्तें: गुरु-दीक्षा, पुरश्चरण (अक्षर × 1000 जप), तर्पण-हवन-अभिषेक-ब्राह्मण भोजन, नियम-पालन (ब्रह्मचर्य, सात्विक आहार), निष्काम भाव। सिद्धि के लक्षण: विशेष गंध/प्रकाश, स्वप्न-दर्शन, स्वतः-स्फुरण।#बीज मंत्र सिद्धि#मंत्र साधना#अनुष्ठान
सही मार्गतंत्र साधना का सही मार्ग क्या है?सही तंत्र मार्ग: योग्य गुरु + दक्षिण मार्ग + नित्य साधना + शुद्ध उद्देश्य + गोपनीयता। कलियुग में दक्षिण मार्ग। गलत: बिना गुरु वाम मार्ग, षट्कर्म दुरुपयोग, अहंकार। तंत्रालोक: 'सर्वत्र शिव का दर्शन।'#सही मार्ग#दक्षिण मार्ग#गुरु
गुरु दीक्षातंत्र साधना में गुरु दीक्षा क्यों जरूरी है?गुरु दीक्षा जरूरी: 'दीयते ज्ञानं क्षाल्यते पापं।' मंत्र में प्राण (बिना दीक्षा 'मृत मंत्र')। शक्तिपात (गुरु की वर्षों की शक्ति हस्तांतरण)। संस्कार शुद्धि। सुरक्षा। तंत्रालोक: 'दीक्षाहीन को न मंत्र सिद्धि, न शक्ति।'#दीक्षा#गुरु#शक्तिपात
गुरु महत्वतंत्र साधना के लिए गुरु क्यों जरूरी है?तंत्र में गुरु अनिवार्य: शक्तिपात (गुरु शक्ति हस्तांतरित)। 'बिना दीक्षा मंत्र सिद्धि नहीं।' अनुभवों में मार्गदर्शन। नकारात्मक शक्तियों से रक्षा। कुलार्णव: 'तंत्रे विना गुरुं बद्धो न मुच्यते।' — गुरु बिना तंत्र में मुक्ति नहीं।#गुरु#दीक्षा#जरूरी
गुरु महत्वमंत्र जप में गुरु की क्या भूमिका होती है?गुरु की भूमिका: मंत्र चयन (स्वभाव अनुसार), शक्तिपात (साधना ऊर्जा हस्तांतरण), सही विधि, बाधाओं में मार्गदर्शन। कुलार्णव: 'गुरु कृपा बिना ज्ञान नहीं।' गुरु न मिलें तो: शास्त्र को गुरु मानें या 'भगवान ही मेरे गुरु' — यह भाव।#गुरु#दीक्षा#शक्तिपात
गुरु और मंत्रक्या बिना गुरु के मंत्र जप किया जा सकता है?बिना गुरु: नाम जप (राम, हरे कृष्ण, ॐ नमः शिवाय) — बिना दीक्षा भी पूर्ण। तंत्र बीज मंत्र — गुरु दीक्षा से अधिक प्रभावशाली। कुलार्णव: 'बिना दीक्षा मंत्र सिद्धि नहीं।' भागवत: भगवान के नाम के लिए कोई अनुमति नहीं। श्रद्धा से जपें — भगवान सुनते हैं।#गुरु#दीक्षा#स्वयं
गुरु महत्वकाली साधना में गुरु क्यों जरूरी है?तांत्रिक काली साधना में गुरु इसलिए जरूरी है क्योंकि: गुरु के मुख से मंत्र 'चैतन्य' होता है; शक्तिपात से गुरु-परंपरा की ऊर्जा मिलती है; साधना में कोई कठिनाई हो तो संरक्षण मिलता है। भक्ति मार्ग (नित्य पूजा-जप) में गुरु अनिवार्य नहीं।#गुरु#दीक्षा#काली साधना
गुरु महत्वकाली साधना में गुरु क्यों जरूरी है?तांत्रिक काली साधना में गुरु इसलिए जरूरी है क्योंकि: गुरु के मुख से मंत्र 'चैतन्य' होता है; शक्तिपात से गुरु-परंपरा की ऊर्जा मिलती है; साधना में कोई कठिनाई हो तो संरक्षण मिलता है। भक्ति मार्ग (नित्य पूजा-जप) में गुरु अनिवार्य नहीं।#गुरु#दीक्षा#काली साधना
गुरु महत्वतंत्र साधना में गुरु क्यों जरूरी है?तंत्र में गुरु इसलिए जरूरी: मंत्र पुस्तक से नहीं, गुरु मुख से जीवंत होता है; शक्तिपात से परंपरा की ऊर्जा मिलती है; व्यक्तिगत साधना क्रम का मार्गदर्शन; साधना की कठिनाइयों में संरक्षण। भक्ति मार्ग में गुरु अनिवार्य नहीं — देवी स्वयं गुरु हैं।#गुरु#दीक्षा#तंत्र
गुरु महत्वतंत्र साधना में गुरु क्यों जरूरी है?तंत्र में गुरु इसलिए जरूरी हैं क्योंकि: वे शक्तिपात से मंत्र को सक्रिय करते हैं, परंपरा की ऊर्जा-श्रृंखला देते हैं, व्यक्तिगत मार्गदर्शन करते हैं और साधना की कठिनाइयों में रक्षा करते हैं। बिना गुरु के गायत्री मंत्र और भक्ति मार्ग अपनाएं।#गुरु#दीक्षा#शक्तिपात
तंत्र सावधानीक्या तंत्र साधना खतरनाक है?भक्ति मार्ग से तंत्र पूजन और गुरु दीक्षा के साथ साधना सुरक्षित है। खतरा तब है जब: बिना गुरु उच्च साधना, नकारात्मक उद्देश्य (वशीकरण, मारण) या मानसिक अस्थिरता में साधना की जाए। तंत्र स्वयं अग्नि की तरह है — उद्देश्य और पद्धति ही इसे सुरक्षित या खतरनाक बनाते हैं।#तंत्र खतरा#सावधानी#भय
शास्त्र ज्ञानउपनिषद में आत्मज्ञान कैसे प्राप्त करें?उपनिषदों में आत्मज्ञान की विधि है — मुमुक्षुत्व → सद्गुरु → श्रवण → मनन → निदिध्यासन → 'नेति नेति' विचार → अपरोक्षानुभूति। बृहदारण्यक (4/4/22) — 'आत्मा श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।' कठोपनिषद (2/24) — आत्मा बलहीन को नहीं मिलती।#आत्मज्ञान#उपनिषद#आत्म-साक्षात्कार
शास्त्र ज्ञानउपनिषद में गुरु का महत्व क्या है?उपनिषदों में गुरु अनिवार्य है। मुण्डकोपनिषद (1/2/12) में श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाने का आदेश है। छान्दोग्य (6/14/2) में गुरु 'अंधे को मार्ग दिखाने वाला' है। श्वेताश्वतर (6/23) — ईश्वर और गुरु में समान भक्ति से ही उपनिषद-ज्ञान प्रकट होता है।#गुरु#उपनिषद#आचार्य
वेद ज्ञानवेदों में गुरु का महत्व क्या है?वेदों में गुरु अनिवार्य है। मुण्डकोपनिषद (1/2/12) — श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के बिना ब्रह्मज्ञान संभव नहीं। तैत्तिरीय उपनिषद (1/11) — 'आचार्यो ब्रह्म भवति' — गुरु स्वयं ब्रह्म है।#गुरु#वेद#गुरु-शिष्य
शास्त्र ज्ञानउपनिषद का अध्ययन कैसे करें?उपनिषद अध्ययन के लिए पहले ईशावास्योपनिषद, फिर कठोपनिषद से आरंभ करें। गुरु के मार्गदर्शन में शंकराचार्य भाष्य सहित पढ़ें। श्रवण → मनन → निदिध्यासन — यही वेदांत-विद्या का राजमार्ग है।#उपनिषद#अध्ययन#वेदांत
वेद ज्ञानवेदों का ज्ञान कैसे प्राप्त करें?वेद-ज्ञान के लिए श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु का आश्रय लें (मुण्डकोपनिषद 1/2/12)। श्रवण → मनन → निदिध्यासन — यही वेदाध्ययन की त्रिवेणी है। आधुनिक काल में वेद-भाष्यों, उपनिषदों और गीता से वेद-ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।#वेद#अध्ययन#गुरु
गुरु-शिष्य परंपराहिंदू धर्म में गुरु का महत्व क्या है?हिंदू धर्म में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। मुण्डकोपनिषद के अनुसार ब्रह्मज्ञान के लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना अनिवार्य है। गुरु को ब्रह्मा-विष्णु-महेश से भी श्रेष्ठ माना गया है — 'गुरुः साक्षात् परब्रह्म।'#गुरु#हिंदू धर्म#गुरु-शिष्य
गुरु-शिष्य परंपरागुरु क्या होता है?गुरु वह है जो अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान का प्रकाश देता है। शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तुल्य माना गया है। मुण्डकोपनिषद के अनुसार ब्रह्मज्ञान के लिए वेदज्ञाता और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना अनिवार्य है।#गुरु#आध्यात्मिक मार्गदर्शक#गुरु-शिष्य