विस्तृत उत्तर
विश्वामित्रजी की आज्ञा पाकर श्रीरामजी ने उठकर पहले गुरु के चरणकमलों को मन में प्रणाम किया और फिर धनुष की ओर बढ़े।
बालकाण्ड में कहा — रामजी ने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य की, मन में सब गुरुजनों, माता-पिता और भगवान शिवजी को प्रणाम किया। फिर सहज भाव से (बिना किसी प्रयास के) धनुष उठा लिया।
श्रीरामजी की विनम्रता यह थी कि सर्वशक्तिमान होते हुए भी उन्होंने पहले गुरु और देवताओं को प्रणाम किया — यह मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श है।





