विस्तृत उत्तर
अहं भक्तपराधीनो श्लोक श्रीमद्भागवत महापुराण नवम स्कंध में दुर्वासा और अम्बरीष प्रसंग में आता है। श्लोक का आरंभ है: अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। इसमें भगवान विष्णु दुर्वासा से कहते हैं कि वे अपने भक्तों के अधीन हैं और मानो स्वतंत्र नहीं हैं। उनके साधु भक्तों ने प्रेम से उनका हृदय अपने वश में कर लिया है। यह श्लोक वैष्णव दर्शन में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि भगवान का हृदय ऐश्वर्य से नहीं, शुद्ध भक्ति से जीता जाता है। अम्बरीष की रक्षा इसी सत्य का उदाहरण है।
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