विस्तृत उत्तर
अर्घ्य का जल अपने मस्तक, कंठ और नेत्रों पर लगाने के पश्चात्, अपने स्थान पर ही खड़े होकर तीन बार प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करनी चाहिए।
तदनंतर सूर्य देव को साष्टांग या पंचांग प्रणाम करना चाहिए।
अर्घ्य के बाद प्रदक्षिणा और प्रणाम कैसे करते हैं को संदर्भ सहित समझें
अर्घ्य के बाद प्रदक्षिणा और प्रणाम कैसे करते हैं का सबसे सीधा सार यह है: अर्घ्य के बाद: अपने स्थान पर ही खड़े होकर तीन बार प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करें। फिर सूर्य देव को साष्टांग (8 अंगों से) या पंचांग (5 अंगों से) प्रणाम...
सूर्य अर्घ्य जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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अर्घ्य का पानी गिरने के बाद क्या करते हैं?
अर्घ्य का जल जब पृथ्वी पर गिरे तो: उस अमृततुल्य जल को दाहिने हाथ की उंगलियों से स्पर्श करके मस्तक, कंठ और दोनों नेत्रों पर लगाएं। यह सूर्य ऊर्जा के आत्मसातीकरण की प्रक्रिया है।
'एहि सूर्य सहस्रांशो' मंत्र का क्या अर्थ है?
'एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥' अर्थ: हे सहस्र किरणों वाले, तेज के भंडार, जगत के स्वामी सूर्य! मुझ पर अनुकम्पा करें और मेरी भक्तिपूर्वक दी अर्घ्य स्वीकार करें, हे दिवाकर!
'ॐ खखोल्खाय स्वाहा' मंत्र का क्या महत्व है?
भविष्य पुराण: श्रीकृष्ण ने पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए 'ॐ खखोल्खाय स्वाहा' मंत्र दिया। साम्ब ने 12 वर्ष चंद्रभागा नदी तट पर तपस्या कर रोग मुक्ति पाई। अर्घ्य देते समय दोनों हथेलियों से जल अर्पण करते हुए मानसिक जप।
मकर संक्रांति पर सूर्य अर्घ्य का मंत्र क्या है?
सूर्य अर्घ्य मंत्र: (1) 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' — 11 या 108 बार, (2) कालिका पुराण: 'ॐ नमो विवस्वते ब्रह्मन् भास्वते विष्णुतेजसे...' (3) 'एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥'
अर्घ्य देते समय दृष्टि कहाँ रखनी चाहिए — इसका वैज्ञानिक कारण क्या है?
अर्घ्य देते समय दृष्टि: गिरती जलधारा के बीच से सूर्य बिंब पर। वैज्ञानिक कारण: क्रोमोथेरेपी (Chromotherapy) का प्राचीन स्वरूप। जलधारा से छनकर प्रातःकालीन सूर्य रश्मियाँ = नेत्र ज्योति वृद्धि + पीनियल ग्रंथि सक्रिय + सर्कैडियन रिदम संतुलित।
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