विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत के अनुसार महाभारत युद्ध के अंत में दुर्योधन की जांघ भीमसेन की गदा से टूट चुकी थी और दोनों पक्षों के अनेक वीर मारे जा चुके थे। उस समय अश्वत्थामा ने अपने स्वामी दुर्योधन का प्रिय कार्य समझकर द्रौपदी के सोते हुए पुत्रों के सिर काटे और उन्हें दुर्योधन के सामने भेंट किया। लेकिन पाठ विशेष रूप से कहता है कि यह घटना दुर्योधन को भी अप्रिय लगी, क्योंकि ऐसे निंदित कर्म की सब लोग निंदा करते हैं। इसलिए अश्वत्थामा का उद्देश्य दुर्योधन को प्रसन्न करना माना गया, पर उसका कर्म धर्मसम्मत या सम्मानजनक नहीं था। वह सोए हुए निरपराध बालकों की हत्या थी, जिसे श्रीकृष्ण ने भी अत्यंत पापपूर्ण और आततायी कर्म बताया।
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