विस्तृत उत्तर
महाभारत और शिव पुराण के अनुसार, गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम और भगवान शिव के अंशावतार थे। शिव के जिस स्वरूप का अंश उनमें था, उसे 'सवन्तिक रुद्र' कहा जाता है।
उत्पत्ति — द्रोणाचार्य ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की घोर तपस्या की। हिमालय स्थित तपेश्वर महादेव नामक स्वयंभू शिवलिंग की आराधना के फलस्वरूप शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में अवतीर्ण होंगे। समय आने पर सवन्तिक रुद्र ने अपने अंश से द्रोण के बलशाली पुत्र अश्वत्थामा के रूप में जन्म लिया।
विशेषताएँ — जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में शिव की कृपा से एक दिव्य मणि विद्यमान थी जो उन्हें दैत्य, दानव, अस्त्र-शस्त्र, रोग, देवता और नाग आदि से निर्भय रखती थी। यह मणि उन्हें बुढ़ापे, भूख, प्यास और थकान से भी बचाती थी।
चिरंजीवी — अश्वत्थामा को भगवान श्रीकृष्ण के श्राप के कारण युगों-युगों तक भटकते रहने का दंड मिला। इस प्रकार वे सप्त चिरंजीवियों में से एक माने जाते हैं।





