विस्तृत उत्तर
भृगु ऋषि और शुक्राचार्य का संबंध पिता-पुत्र का था। शुक्राचार्य महर्षि भृगु और काव्या माता के पुत्र माने जाते हैं। वे भृगुवंश के तेजस्वी ऋषि थे, लेकिन उन्होंने असुरों के गुरु के रूप में कार्य किया। उनके पास गहरा वेदज्ञान, नीति और तपोबल था। असुरों की सबसे बड़ी शक्ति उनका बाहुबल नहीं, बल्कि शुक्राचार्य का मार्गदर्शन और बाद में प्राप्त मृत संजीवनी विद्या थी। काव्या माता वध की घटना ने इस परिवार को देवासुर संघर्ष के केंद्र में ला दिया। भृगु ने विष्णु को श्राप दिया और शुक्राचार्य ने असुरों का पक्ष और दृढ़ कर लिया।
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