विस्तृत उत्तर
महाभारत में हंस गीता शांति पर्व के मोक्षधर्म पर्व में आती है। कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर शोक और वैराग्य में डूबे थे, तब भीष्म पितामह ने उन्हें अनेक धर्म और मोक्ष के उपदेश दिए। इसी क्रम में हंस गीता का वर्णन आता है। इस प्रसंग में हंस स्वरूप साध्य देवों को सत्य, आत्मसंयम, क्षमा, सहनशीलता और करुणा का उपदेश देता है। भागवत की हंस गीता जहाँ आत्मा-मन-विषय और तुरीय अवस्था पर केंद्रित है, वहीं महाभारत की हंस गीता व्यावहारिक मोक्षधर्म और साधु-चरित्र के गुणों पर विशेष प्रकाश डालती है।
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