विस्तृत उत्तर
संवर्तक अग्नि के बाद पुष्करावर्तक वर्षा से पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग सब डूब जाते हैं। तब सारा ब्रह्मांड महाकारणार्णव में बदल जाता है।
महाकारणार्णव कैसे बनता है को संदर्भ सहित समझें
महाकारणार्णव कैसे बनता है का सबसे सीधा सार यह है: प्रलय-वर्षा से समस्त लोक जलमग्न होकर महाकारणार्णव बनते हैं।
लोक जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.
इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।
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इसी विषय के 5 प्रश्न
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ब्रह्मांड जलमग्न कैसे होता है?
प्रलय-वर्षा से सभी लोक अथाह जल में डूब जाते हैं।
मार्कण्डेय मुनि की तपस्या और महर्लोक के बीच क्या संबंध है?
मार्कण्डेय मुनि की अखंड तपस्या उन्हें महर्लोक का अधिकारी बनाती है। नैमित्तिक प्रलय के एकार्णव में उन्होंने अपने योगबल से विचरण करते हुए भगवान विष्णु के बालक स्वरूप के दर्शन किए।
नैमित्तिक और प्राकृतिक प्रलय में महर्लोक की अवस्था में क्या अंतर है?
नैमित्तिक प्रलय में महर्लोक भस्म नहीं होता, केवल निर्जन होता है और ऋषि लौट आते हैं। प्राकृतिक महाप्रलय में महर्लोक सहित सभी 14 लोक पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं।
संकर्षण की अग्नि क्या है?
संकर्षण की अग्नि (कालानल) पाताल के मूल में स्थित भगवान शेषनाग के मुख से नैमित्तिक प्रलय में उत्पन्न होती है और पाताल से ऊपर उठकर त्रैलोक्य को भस्म करती है।
महर्लोक की 'कृतकाकृतक' प्रकृति का क्या अर्थ है?
कृतकाकृतक = आंशिक रूप से विनाशी (कृतक) + आंशिक रूप से अविनाशी (अकृतक)। नैमित्तिक प्रलय में महर्लोक भस्म नहीं होता पर निर्जन हो जाता है — यही इसकी मिश्र प्रकृति है।
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