विस्तृत उत्तर
त्रैलोक्य को भस्म करने वाली प्रलय की अग्नि केवल सूर्य से ही नहीं अपितु ब्रह्माण्ड के सबसे निचले तल (पाताल) के मूल में स्थित भगवान शेषनाग (सङ्कर्षण) के मुख से उत्पन्न होती है जिसे सङ्कर्षण की अग्नि या कालानल कहा जाता है। सङ्कर्षण भगवान विष्णु के शेषनाग स्वरूप हैं जो समस्त ब्रह्माण्ड को अपने फनों पर धारण करते हैं। नैमित्तिक प्रलय के समय इन्हीं शेषनाग के मुख से यह प्रलयंकारी अग्नि उत्पन्न होती है जो पाताल से ऊपर की ओर उठकर भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक को जलाकर भस्म कर देती है। इस अग्नि की प्रचंड लपटें और असहनीय ताप ऊपर की ओर उठकर महर्लोक तक पहुँचता है जिससे वहाँ के ऋषि-मुनि जनलोक की ओर पलायन करते हैं।
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