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जीवन एवं मृत्यु⏱ 2 मिनट पठन

क्या मृत्यु के समय व्यक्ति बोल सकता है?

गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के समय सबसे पहले बोलने की शक्ति चली जाती है।

संक्षिप्त उत्तर

गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के समय सबसे पहले बोलने की शक्ति चली जाती है। व्यक्ति सुन और अनुभव कर सकता है, परंतु बोल नहीं पाता। इसीलिए मरणासन्न व्यक्ति को भगवान का नाम सुनाने का विधान है।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण में स्पष्ट वर्णन है कि मृत्यु के निकट आने पर सबसे पहले व्यक्ति की वाक् शक्ति — बोलने की क्षमता — समाप्त हो जाती है। जब यमदूत आत्मा को लेने आते हैं, उस क्षण व्यक्ति की जिह्वा और वाणी पर उसका नियंत्रण नहीं रहता। वह सब कुछ अनुभव कर रहा होता है, परंतु बोल नहीं पाता।

गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'वह बोलना चाहता है लेकिन बोल नहीं पाता। उस समय शरीर की सभी इंद्रियाँ — बोलने, सुनने, हिलने-डुलने की शक्ति — एक-एक करके क्षीण होती जाती हैं।' इस कारण से मरणासन्न व्यक्ति से किसी अंतिम बात की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।

यह शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इसीलिए सनातन परंपरा में यह विधान है कि मरणासन्न व्यक्ति के कान में भगवान का नाम, गीता के श्लोक या गरुड़ पुराण का पाठ सुनाया जाए — क्योंकि सुनने की शक्ति वाणी की तुलना में अधिक देर तक बनी रहती है।

जो व्यक्ति जीवन भर ईश्वर-स्मरण में रहा हो, उसकी मृत्यु अपेक्षाकृत अधिक शांत होती है और उसकी चेतना अंत तक अधिक स्थिर रहती है।

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