विस्तृत उत्तर
नारदजी ने जब जल में अपना वानर मुख देखा तो अत्यन्त क्रोधित हुए। रास्ते में भगवान विष्णु लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी के साथ मिले। भगवान ने मीठी वाणी से पूछा — 'हे मुनि! व्याकुलकी तरह कहाँ चले?' यह सुनकर नारदजी को और क्रोध आया।
नारदजी ने भगवान को शाप दिया कि आपने मेरा जगत में उपहास कराया, अतः आपको भी मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ेगा और स्त्री-विरह का दुख सहना पड़ेगा।
बालकाण्ड में इसका संक्षिप्त उल्लेख है। भगवान ने शाप को सिरपर चढ़ाकर (स्वीकार करके), हृदयमें हर्षित होते हुए नारदजीसे बहुत विनती की और कृपानिधान भगवानूने अपनी मायाकी प्रबलता खींच ली (माया हटा ली)।
जब भगवान ने माया हटाई तो वहाँ न लक्ष्मी रह गयीं, न राजकुमारी। तब नारदजी ने भयभीत होकर श्रीहरिके चरण पकड़कर कहा — 'हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिये।'





