विस्तृत उत्तर
पार्वतीजी की तपस्या अत्यन्त कठोर थी। बालकाण्ड में इसका क्रमबद्ध वर्णन है:
- 1पहले एक हज़ार वर्षतक केवल कन्दमूल और फल खाये — 'संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥'
- 1फिर सौ वर्ष केवल साग खाकर बिताये।
- 1फिर कुछ दिन केवल जल और वायुका भोजन किया, फिर कठोर उपवास किये — 'कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥'
- 1फिर तीन हज़ार वर्ष तक केवल सूखे बेलपत्र खाये जो पृथ्वीपर गिरते थे — 'बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥'
- 1अन्त में सूखे पत्ते (पर्ण) भी छोड़ दिये — 'पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना॥'
जब पत्ते भी छोड़ दिये तब उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा (अ = बिना, पर्णा = पत्ते = पत्ते के बिना रहने वाली)।
तपसे उनका शरीर क्षीण हो गया और आकाशसे गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई — 'भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि। परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥'
अर्थ — हे पर्वतराजकी कुमारी! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू सारे असह्य क्लेशोंको (कठिन तपको) त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे।
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