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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 2 मिनट पठन

पार्वतीजी की तपस्या कितनी कठोर थी — क्या-क्या त्यागा?

पार्वतीजी की तपस्या अत्यन्त कठोर थी।

संक्षिप्त उत्तर

क्रमशः — (1) 1000 वर्ष कन्दमूल-फल, (2) 100 वर्ष केवल साग, (3) कुछ दिन जल-वायु फिर उपवास, (4) 3000 वर्ष केवल सूखे बेलपत्र, (5) पत्ते भी छोड़े — तब 'अपर्णा' नाम पड़ा। शरीर क्षीण हुआ तब ब्रह्मवाणी हुई — 'अब मिलिहहिं त्रिपुरारि' — शिवजी मिलेंगे।

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विस्तृत उत्तर

पार्वतीजी की तपस्या अत्यन्त कठोर थी। बालकाण्ड में इसका क्रमबद्ध वर्णन है:

  1. 1पहले एक हज़ार वर्षतक केवल कन्दमूल और फल खाये — 'संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥'
  1. 1फिर सौ वर्ष केवल साग खाकर बिताये।
  1. 1फिर कुछ दिन केवल जल और वायुका भोजन किया, फिर कठोर उपवास किये — 'कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥'
  1. 1फिर तीन हज़ार वर्ष तक केवल सूखे बेलपत्र खाये जो पृथ्वीपर गिरते थे — 'बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥'
  1. 1अन्त में सूखे पत्ते (पर्ण) भी छोड़ दिये — 'पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना॥'

जब पत्ते भी छोड़ दिये तब उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा (अ = बिना, पर्णा = पत्ते = पत्ते के बिना रहने वाली)।

तपसे उनका शरीर क्षीण हो गया और आकाशसे गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई — 'भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि। परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥'

अर्थ — हे पर्वतराजकी कुमारी! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू सारे असह्य क्लेशोंको (कठिन तपको) त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे।

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