विस्तृत उत्तर
पार्वतीजी ने वन में जाकर तपस्या की।
चौपाई — 'उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥'
इसका अर्थ — प्राणपति (शिवजी) के चरणोंको हृदयमें धारण करके पार्वतीजी वनमें जाकर तप करने लगीं।
आगे कहा — 'अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥'
अर्थ — पार्वतीजीका अत्यन्त सुकुमार शरीर तपके योग्य नहीं था, तो भी पतिके चरणोंका स्मरण करके उन्होंने सब भोगोंको त्याग दिया।
माता-पिताको बहुत तरहसे समझाकर बड़े हर्षके साथ पार्वतीजी तप करनेके लिये चलीं। प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता सब व्याकुल हो गये। किसीके मुँहसे बात नहीं निकलती थी।
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