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विस्तृत उत्तर
प्रेत अवस्था में आत्मा वायव्य शरीर में यममार्ग की कठिन यात्रा करती है। इस यात्रा में उसे पृथ्वी पर पुत्र द्वारा दिए गए दैनिक पिण्ड, मासिक श्राद्ध और तर्पण से बल व पोषण प्राप्त होता है। यदि पितर प्रेत योनि में है, तो श्राद्ध का अन्न उसे बल के रूप में पहुँचता है और उसकी यात्रा में सहायक बनता है।
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