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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

राजा दशरथ ने श्रीरामजी को देने में क्या आपत्ति जताई?

दशरथ का हृदय काँपा — 'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई।

संक्षिप्त उत्तर

दशरथ का हृदय काँपा — 'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई। राम देत नहिं बनइ गोसाई' — सब पुत्र प्राण समान हैं, राम को देना सम्भव नहीं। कहाँ भयानक राक्षस और कहाँ मेरा सुकुमार किशोर पुत्र!

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विस्तृत उत्तर

राजा दशरथ ने विश्वामित्रजी की माँग सुनकर बड़ी व्याकुलता प्रकट की। उनका हृदय काँप उठा और मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। उन्होंने कहा कि चौथेपन में चार पुत्र पाये हैं, राम को देना सम्भव नहीं।

चौपाई — 'सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी। चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥'

अर्थ — यह अत्यन्त अप्रिय वाणीको सुनकर राजाका हृदय काँप उठा और उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। उन्होंने कहा — हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपनमें चार पुत्र पाये हैं, आपने विचारकर बात नहीं कही।

आगे — 'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई। राम देत नहिं बनइ गोसाई। कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥'

अर्थ — सभी पुत्र मुझे प्राणोंके समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो! रामको तो किसी प्रकार भी देते नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ परम किशोर अवस्थाके मेरे सुन्दर पुत्र!

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

राजा दशरथ ने श्रीरामजी को देने में क्या आपत्ति जताई को संदर्भ सहित समझें

राजा दशरथ ने श्रीरामजी को देने में क्या आपत्ति जताई का सबसे सीधा सार यह है: दशरथ का हृदय काँपा — 'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई। राम देत नहिं बनइ गोसाई' — सब पुत्र प्राण समान हैं, राम को देना सम्भव नहीं।...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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