विस्तृत उत्तर
राजा दशरथ ने विश्वामित्रजी की माँग सुनकर बड़ी व्याकुलता प्रकट की। उनका हृदय काँप उठा और मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। उन्होंने कहा कि चौथेपन में चार पुत्र पाये हैं, राम को देना सम्भव नहीं।
चौपाई — 'सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी। चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥'
अर्थ — यह अत्यन्त अप्रिय वाणीको सुनकर राजाका हृदय काँप उठा और उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी। उन्होंने कहा — हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपनमें चार पुत्र पाये हैं, आपने विचारकर बात नहीं कही।
आगे — 'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई। राम देत नहिं बनइ गोसाई। कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥'
अर्थ — सभी पुत्र मुझे प्राणोंके समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो! रामको तो किसी प्रकार भी देते नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ परम किशोर अवस्थाके मेरे सुन्दर पुत्र!





