विस्तृत उत्तर
श्रीरामजी के चरण-स्पर्श से शिलारूप अहल्या तुरन्त तपोमूर्ति (तपस्या की साक्षात मूर्ति) के रूप में प्रकट हो गयीं।
छन्द में वर्णन — 'अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरननि लागी जुगल नयन जलधार बही॥'
अर्थ — अत्यन्त प्रेमके कारण वह अधीर हो गयी। उसका शरीर पुलकित हो उठा; मुखसे वचन कहनेमें नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभुके चरणोंसे लिपट गयी और उसके दोनों नेत्रोंसे जल (प्रेम और आनन्दके आँसुओं) की धारा बहने लगी।
फिर धीरज धरकर अहल्या ने प्रभु को पहचाना, रघुपति की कृपा से भक्ति प्राप्त की और अत्यन्त निर्मल वाणीसे स्तुति की। अन्त में उसने कहा — हे प्रभो! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही विनती है कि मेरा मनरूपी भौंरा आपके चरणकमलों की रजके प्रेमरूपी रसका सदा पान करता रहे। फिर अहल्या आनन्द में भरी हुई पतिलोक चली गयी।





