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विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन का विष भगवान शिव ने पिया था। जब क्षीरसागर से हलाहल या कालकूट विष निकला, तो उसका प्रभाव इतना भयंकर था कि संपूर्ण ब्रह्मांड संकट में पड़ गया। देवता, असुर और ऋषि कोई भी उस विष को संभाल नहीं पा रहे थे। तब सभी शिव जी की शरण में गए। शिव ने करुणा और लोककल्याण के लिए विष को अपनी हथेली पर लिया और पी लिया। माता पार्वती ने उनका गला पकड़ लिया, जिससे विष पेट में न जाकर कंठ में ही ठहर गया। इसी से शिव नीलकंठ कहलाए।
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