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विस्तृत उत्तर
समुद्र मंथन की कहानी इंद्र के अहंकार और दुर्वासा ऋषि के श्राप से शुरू होती है। श्राप के कारण देवताओं का तेज, बल और ऐश्वर्य नष्ट हो गया और असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवता भगवान विष्णु के पास गए, तब विष्णु ने उन्हें असुरों से संधि करके क्षीरसागर मंथन करने की सलाह दी। मंदराचल पर्वत मथानी बना, वासुकी नाग रस्सी बना और विष्णु ने कूर्मावतार लेकर पर्वत को आधार दिया। मंथन से पहले हलाहल विष निकला, जिसे शिव ने पिया, और अंत में धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
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