विस्तृत उत्तर
पार्वतीजी का दृढ़ संकल्प देखकर सप्तर्षि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें 'जगज्जननी' (जगत की माता) कहकर आशीर्वाद दिया।
चौपाई — 'देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥'
अर्थ — (शिवजीमें पार्वतीजीका ऐसा) प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले — हे जगज्जननी! हे भवानी! आपकी जय हो! जय हो!
दोहा — 'तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु। नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥'
अर्थ — आप माया हैं और शिवजी भगवान् हैं। आप दोनों समस्त जगतके माता-पिता हैं। यह कहकर मुनि पार्वतीजीके चरणोंमें सिर नवाकर चल दिये। उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे।
इस प्रकार सप्तर्षियों ने पार्वतीजी को जगदम्बा, माया-स्वरूपा और शिवजी की शक्ति के रूप में पहचानकर उनके चरणों में प्रणाम किया।




