विस्तृत उत्तर
सप्तर्षियों ने पार्वतीजी से पहले पूछा कि तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो। फिर शिवजी की निन्दा करके उनका संकल्प डिगाने का प्रयास किया।
सप्तर्षियों ने शिवजी के बारे में कहा — 'महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥'
अर्थ — माना कि महादेवजी अवगुणोंके भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणोंके धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको उसीसे काम है।
उन्होंने नारदजी के उपदेश की भी आलोचना की — दक्षके पुत्रोंको, चित्रकेतु को और हिरण्यकशिपु को नारदजी के उपदेश से क्या हुआ? सबका घर बर्बाद हुआ।
फिर शिवजी को निर्गुण, निलज (निर्लज्ज), कुबेष (कुवेषी), अकुल (कुलहीन), उदासीन, अगेह (बेघर), दिगम्बर (नग्न) बताया — ऐसे वर को कौन चाहेगा?





