विस्तृत उत्तर
शिवजी ने दण्डकवन में एक राजपुत्र (श्रीरामजी) को देखकर उन्हें 'सच्चिदानन्द परधामा' (सच्चिदानन्द परमधाम) कहकर प्रणाम किया।
चौपाई — 'तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा। भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥'
इसका अर्थ — उन्होंने (शिवजी ने) एक राजपुत्रको 'सच्चिदानन्द परमधाम' कहकर प्रणाम किया और उसकी शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गये कि अबतक उनके हृदयमें प्रीति रोकनेसे भी नहीं रुकती।
इसके बाद सतीजी के मन में संदेह उठा कि शिवजी ने एक साधारण वनवासी राजपुत्र को प्रणाम क्यों किया जो अपनी पत्नी की खोज में दुखी होकर भटक रहा है। यही संदेह सती-शिव प्रसंग का मूल कारण बना।





