विस्तृत उत्तर
सीताजी ने गिरिजा (पार्वती) मन्दिर में पार्वतीजी के चरणों में वन्दना करके प्रार्थना की कि उन्हें मनोवांछित वर (श्रीरामजी) मिलें।
सीताजी ने पार्वतीजी की स्तुति की — 'जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥'
अर्थ — हे पर्वतराज हिमाचलकी पुत्री पार्वती! आपकी जय हो, जय हो। हे महादेवजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी चकोरी! आपकी जय हो। हे गणेशजी और छः मुखवाले स्वामिकार्तिकजीकी माता! हे जगज्जननी! हे बिजलीकी-सी कान्तियुक्त शरीरवाली! आपकी जय हो!
फिर सीताजी ने कहा — 'मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥'
अर्थ — मेरे मनोरथको आप भलीभाँति जानती हैं; क्योंकि आप सदा सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजीने उनके चरण पकड़ लिये।





