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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

सीताजी ने गिरिजा (पार्वती) मन्दिर में क्या प्रार्थना

सीताजी ने गिरिजा (पार्वती) मन्दिर में पार्वतीजी के चरणों में वन्दना करके प्रार्थना की कि उन्हें मनोवांछित वर (श्रीरामजी) मिलें।

संक्षिप्त उत्तर

सीताजी ने पार्वतीजी की स्तुति की — 'जय जय गिरिबरराज किसोरी' — और कहा कि मेरा मनोरथ आप जानती हैं, आप सबके हृदय में बसती हैं, इसलिये प्रकट नहीं किया। चरण पकड़कर मनोवांछित वर (रामजी) की प्रार्थना की।

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विस्तृत उत्तर

सीताजी ने गिरिजा (पार्वती) मन्दिर में पार्वतीजी के चरणों में वन्दना करके प्रार्थना की कि उन्हें मनोवांछित वर (श्रीरामजी) मिलें।

सीताजी ने पार्वतीजी की स्तुति की — 'जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी। जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥'

अर्थ — हे पर्वतराज हिमाचलकी पुत्री पार्वती! आपकी जय हो, जय हो। हे महादेवजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी चकोरी! आपकी जय हो। हे गणेशजी और छः मुखवाले स्वामिकार्तिकजीकी माता! हे जगज्जननी! हे बिजलीकी-सी कान्तियुक्त शरीरवाली! आपकी जय हो!

फिर सीताजी ने कहा — 'मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥'

अर्थ — मेरे मनोरथको आप भलीभाँति जानती हैं; क्योंकि आप सदा सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजीने उनके चरण पकड़ लिये।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

सीताजी ने गिरिजा (पार्वती) मन्दिर में क्या प्रार्थना की को संदर्भ सहित समझें

सीताजी ने गिरिजा (पार्वती) मन्दिर में क्या प्रार्थना की का सबसे सीधा सार यह है: सीताजी ने पार्वतीजी की स्तुति की — 'जय जय गिरिबरराज किसोरी' — और कहा कि मेरा मनोरथ आप जानती हैं, आप सबके हृदय में बसती हैं, इसलिये प्रकट...

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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