विस्तृत उत्तर
विश्वकर्मा द्वारा सुदर्शन चक्र बनाने की कथा सूर्यदेव और उनकी पत्नी संजना से जुड़ी है।
देवशिल्पी विश्वकर्मा की पुत्री संजना का विवाह सूर्यदेव से हुआ था। परंतु सूर्य का तेज और उष्णता इतनी प्रचंड थी कि संजना उनके समीप रहने में असमर्थ हो गईं। जब संजना ने अपने पिता विश्वकर्मा से यह कष्ट बताया, तो उन्होंने सूर्यदेव को खराद (वर्कशॉप) पर चढ़ाकर उनके तेज का एक अंश घटाने का निश्चय किया।
विश्वकर्मा ने सूर्य के तेज को एक खास यंत्र से छीला और उनकी दिव्य प्रभा कम की। इस प्रक्रिया में सूर्य का जो अत्यंत पवित्र, तेजस्वी और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से युक्त 'धूल' (तेज के अंश) एकत्र हुई, उससे विश्वकर्मा ने तीन परम दिव्य वस्तुएं बनाईं — पहली पुष्पक विमान जो हवा में उड़ने वाला था, दूसरा भगवान शिव का त्रिशूल और तीसरा भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र।
इस प्रकार सूर्य के तेज से निर्मित होने के कारण सुदर्शन चक्र अग्निमय, दीप्तिमान और असाधारण ऊर्जा का भंडार है — यही इसकी अचूक शक्ति का रहस्य है।





