विस्तृत उत्तर
शार्ङ्ग (शारंग) भगवान विष्णु का दिव्य धनुष है जिसे विश्वकर्मा ने निर्मित किया था और जिसकी एक गौरवशाली परंपरा पुराणों में वर्णित है।
शार्ङ्ग धनुष की उत्पत्ति के विषय में पुराणों में वर्णन है कि एक बार ब्रह्माजी जानना चाहते थे कि भगवान विष्णु और शिव में श्रेष्ठ तीरंदाज कौन है। तब दोनों के बीच एक द्वंद्वयुद्ध हुआ। उस युद्ध में विष्णु के बाणों से शिव पराजित हुए। इसके बाद क्रोधित शिव ने अपना धनुष पिनाक राजा देवरथ (सीता के पिता जनक के पूर्वज) को दे दिया और विष्णु ने अपना धनुष शार्ङ्ग ऋषि ऋचिक को दे दिया।
शार्ङ्ग की परंपरा — ऋचिक → परशुराम (विष्णु अवतार) → राम (राम ने परशुराम की चुनौती पर इसे उठाया) → राम ने वरुण को दिया → खांडव-दहन में वरुण ने कृष्ण को भेंट किया।
यह धनुष दिव्य बाण चलाने और असीमित बाण-भंडार प्रदान करने में सक्षम था। श्रीकृष्ण के पास अंतिम समय तक यह था — कुरुक्षेत्र से लौटते समय उन्होंने इसे समुद्र में फेंककर वरुण को वापस कर दिया।





