विस्तृत उत्तर
विवाह के बाद कैलास पर पार्वतीजी ने शिवजी से रामकथा सुनने की जिज्ञासा प्रकट की। शिवजी ने शम्भु चरित्र (अपना और पार्वतीजी का विवाह-प्रसंग) संक्षेप में सुनाया और फिर रामावतार कथा सुनाने का निर्णय किया।
दोहा — 'चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु। बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु॥'
अर्थ — गिरिजापति (शिवजी) का चरित्र समुद्रके समान (अपार) है, उसका पार वेद भी नहीं पाते। तब अत्यन्त मन्दबुद्धि और गँवार तुलसीदास उसका वर्णन कैसे कर सकता है!
इसके बाद भरद्वाजजी ने शिवचरित सुनकर बहुत सुख पाया और कथा सुनने की लालसा और बढ़ गयी — 'संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा॥'
यहाँ से शिव-पार्वती संवाद के माध्यम से रामावतार की कथा शुरू होती है।





