शिव पूजा विधिशिवलिंग पर रात को पूजा करना शुभ है या अशुभ?रात्रि पूजा अत्यंत शुभ। महाशिवरात्रि: चार प्रहर रात्रि पूजा सर्वश्रेष्ठ (शिव पुराण)। प्रदोष काल (संध्या): शिव पूजा का श्रेष्ठ समय (स्कन्द पुराण)। शिव = महाकाल, समय से परे। प्रातःकाल नियमित पूजा, रात्रि विशेष अवसरों पर — दोनों शुभ।#रात्रि पूजा#प्रदोष#शिवरात्रि
शिव मंत्रशिव अष्टोत्तर शतनामावली का जप कैसे करें?'ॐ [नाम]ाय नमः' — 108 नाम, प्रत्येक पर बेलपत्र/पुष्प अर्पित। 15-20 मिनट। सोमवार/शिवरात्रि/सावन। विकल्प: 'ॐ नमः शिवाय' 108 बार। उन्नत: सहस्रनाम (1000 नाम)।#अष्टोत्तर#108 नाम#शतनामावली
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर घी का दीपक जलाना आवश्यक है या तेल का भी चलता है?घी का दीपक सर्वश्रेष्ठ (शिव पुराण) — सात्विक, वंश वृद्धि, सुख-शांति। सरसों/तिल तेल का दीपक भी स्वीकार्य — शत्रु नाश, शनि दोष शांति। रिफाइंड/वनस्पति घी कभी न जलाएं। दीपक शिवलिंग की दाहिनी ओर रखें। रूई की बत्ती ही प्रयोग करें। विशेष पूजा में घी अनिवार्य।#दीपक#घी#तेल
शिव महिमाशिव जी के तीसरे नेत्र की उत्पत्ति कैसे हुई?शिव जी का तीसरा नेत्र तब प्रकट हुआ जब माता पार्वती ने उनकी दोनों आँखें ढक दीं और सृष्टि में अंधकार छा गया — शिव ने संकट में तीसरा नेत्र प्रकट किया। एक अन्य कथा में कामदेव द्वारा तप भंग करने पर तीसरा नेत्र खुला और कामदेव भस्म हुए।#शिव तीसरा नेत्र#त्रिनेत्र#पार्वती
शिव मंदिरउज्जैन महाकालेश्वर की भस्म आरती का रहस्य क्या है?12 ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकालेश्वर में भस्म आरती। सुबह 4 बजे, ~2 घंटे। पौराणिक: दूषण राक्षस भस्म → शिव श्रृंगार। प्राचीन: श्मशान भस्म; वर्तमान: गाय गोबर + 6 वृक्ष लकड़ी। अघोर मंत्र से भस्म रमाना। निराकार दर्शन = मोक्ष। 6 दैनिक आरतियां।#महाकालेश्वर#भस्म आरती#उज्जैन
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर चावल चढ़ाने की परंपरा किस पुराण में वर्णित है?शिव पुराण में अक्षत (साबुत चावल) शिवलिंग पर चढ़ाने का विधान है। टूटे चावल सर्वथा वर्जित (शिव पुराण)। रुद्राभिषेक में 108 दाने का विधान। चावल पूर्णता, अन्न समृद्धि और सात्विकता का प्रतीक। श्वेत, साबुत, बिना कुमकुम/हल्दी के सादे अक्षत ही चढ़ाएं।#चावल#अक्षत#शिवलिंग
कार्तिकेय कथातारकासुर के वध के लिए शिव-पुत्र की जरूरत क्यों थी?तारकासुर ने ब्रह्मा से यह वरदान लिया था कि उसका वध केवल शिव-पुत्र से होगा। उसने यह सोचकर यह माँगा था कि संन्यासी शिव का पुत्र कभी नहीं होगा। इस वरदान को पूरा करने के लिए ही कार्तिकेय का जन्म आवश्यक था।#तारकासुर वरदान#शिव पुत्र#तारकासुर वध
शिव साधनाशिव की अघोर साधना क्या होती है और इसके क्या नियम हैं?अघोर = जो भयानक नहीं, सर्वत्र शिव दर्शन। शिव का अघोर मुख (दक्षिण) संहार शक्ति का प्रतीक। द्वैत नष्ट करने की साधना — जीवन-मृत्यु, शुभ-अशुभ में समभाव। श्मशान साधना प्रमुख अंग। गुरु दीक्षा अनिवार्य। सामान्य व्यक्ति के लिए नहीं। ढोंगियों से सावधान। सच्चा अघोर मार्ग अत्यंत कठिन और पवित्र।#अघोर#अघोर साधना#शिव के पंचमुख
शिव महिमाशिव जी शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं?शिव जी भस्म इसलिए लगाते हैं क्योंकि वे मृत्यु के स्वामी हैं और भस्म शरीर की नश्वरता का बोध कराती है। एक कथा के अनुसार सती के भस्म होने के बाद उन्होंने उसे अपने शरीर पर लगाया। भस्म पाप-नाशक, वैराग्य की प्रतीक और उनका श्रृंगार भी है।#शिव भस्म#चिताभस्म#भोलेनाथ
शिव पूजा नियमशिव की पूजा के समय दीपक बुझ जाए तो क्या अशुभ होता है?लोक मान्यता: अशुभ। शास्त्रीय: भौतिक कारण (हवा/घी/बत्ती) — शिव नाराज नहीं होते। क्या करें: पुनः जलाएं, 'ॐ नमः शिवाय' 3 बार, पूजा जारी रखें। अत्यधिक अंधविश्वास से बचें।#दीपक#बुझना#अशुभ
शिव पर्वसावन के पहले सोमवार की पूजा में क्या विशेष करें?पूरे सावन के व्रत का संकल्प लें। गंगाजल/कावड़ जल से अभिषेक। नई रुद्राक्ष माला अभिमंत्रित। दूध+शक्कर अभिषेक। बेलपत्र माला। शिव चालीसा/महामृत्युंजय नियमित आरंभ। दान (श्वेत वस्तुएं)। प्रदोष काल विशेष पूजा।#पहला सोमवार#सावन#विशेष
शिव महिमादक्ष ने यज्ञ में शिव जी का अपमान कैसे किया?दक्ष ने यज्ञ में शिव का भाग नहीं रखा और सती के सामने ही शिव को श्मशानवासी, अघोरी और देवताओं के अयोग्य कहकर कटु अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। देवताओं ने भी दक्ष के भय से शिव का पक्ष नहीं लिया।#दक्ष शिव अपमान#सती#यज्ञ
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर चमेली का तेल चढ़ाने की विधि क्या है?चमेली का तेल शिव-प्रिय सुगंधित द्रव्य है — श्रृंगार में केवल इत्र/सुगंधित तेल शिवलिंग पर स्वीकार्य। विधि: जलाभिषेक → चंदन तिलक → चमेली तेल की कुछ बूंदें → बेलपत्र। लाभ: भूमि-वाहन सुख, सकारात्मकता, वैवाहिक मधुरता। शुद्ध प्राकृतिक तेल ही प्रयोग करें।#चमेली#तेल#इत्र
शिव साधनागौरीशंकर रुद्राक्ष पहनने का क्या लाभ है और कैसे पहनें?दो प्राकृतिक जुड़े दाने = शिव-पार्वती। लाभ: दाम्पत्य सुख, विवाह योग, शिव-शक्ति संतुलन, हृदय चक्र। सोमवार/शिवरात्रि धारण, गंगाजल शुद्धि, 108 जप, गले में हृदय पास। असली दुर्लभ — नकली से बचें।#गौरीशंकर#रुद्राक्ष#शिव-पार्वती
शिव रूपदक्षिणामूर्ति शिव की उपासना का क्या महत्व है?दक्षिणामूर्ति = शिव का परम गुरु स्वरूप। दक्षिणामूर्ति उपनिषद् (यजुर्वेद): 24 अक्षर मंत्र। शंकराचार्य स्तोत्र: अद्वैत सार, 'मोक्ष शास्त्र'। मौन गुरु — वृद्ध शिष्यों के संशय छिन्न। गुरु न मिले तो इन्हें गुरु मानें। गुरुवार/गुरु पूर्णिमा विशेष। विद्यार्थियों के लिए बुद्धि वृद्धि।#दक्षिणामूर्ति#गुरु#ज्ञान
शिव महिमाशिव जी के माथे पर चंद्रमा कैसे आया, शिव पुराण में क्या लिखा है?शिव पुराण के अनुसार दक्ष के श्राप से क्षयग्रस्त चंद्रमा ने शिव की कठोर तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर चंद्रमा को मृत्यु से बचाया और अपने मस्तक पर धारण किया। इसी कारण शिव 'चंद्रशेखर' कहलाए और सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई।#शिव चंद्रशेखर#चंद्रमा दक्ष श्राप#शिव पुराण
शिव मंत्रशिव मंत्र जप में गौमुखी थैली का प्रयोग क्यों किया जाता है?गोमुखी = जप माला की थैली (गाय के मुख आकार)। प्रयोग कारण: (1) जप गोपनीय रहता है — दृष्टि दोष से बचाव। (2) तर्जनी स्वतः बाहर — शास्त्रीय नियम पालन। (3) माला शुद्ध रहती है। (4) एकाग्रता बढ़ती है। (5) साधना शक्ति संरक्षित रहती है। ऊनी या सूती कपड़े की होनी चाहिए।#गौमुखी#जप माला#गोपनीयता
शिव साधनाशिव साधना में मौन व्रत का क्या महत्व है?शिव = मौन और चेतना का स्वरूप (कश्मीर शैव दर्शन)। मौन से: वाक् शक्ति संचय, मन एकाग्र, आत्मनिरीक्षण, कर्म बंधन क्षय, वाणी दोष निवारण। दक्षिणामूर्ति शिव = मौन ज्ञान का प्रतीक। मौनी अमावस्या/महाशिवरात्रि पर विशेष फलदायी। 'मुनि' शब्द 'मौन' से ही उत्पन्न।#मौन व्रत#साधना#वाक् संयम
आरती लाभॐ जय शिव ओंकारा आरती का महत्व?शिव सबसे प्रसिद्ध आरती। 'मनवांछित फल पावे'। पाप नाश, मोक्ष, रोग मुक्ति। ओंकारा=ॐ=शिव। सोमवार/प्रदोष/शिवरात्रि/श्रावण।#जय शिव ओंकारा#शिव#आरती
शिव साधनाशिव उपासना में गृहस्थ और संन्यासी की विधि में क्या भेद है?गृहस्थ: षोडशोपचार पूजा, कामना सहित, पत्नी सहित, व्रत-उपवास, सात्विक जीवन, मंदिर दर्शन। संन्यासी: निष्काम भक्ति, आत्मध्यान प्रधान, पूर्ण ब्रह्मचर्य, भस्म-रुद्राक्ष, एकांत साधना, समाधि-योग। समानता: शिव भक्ति भाव देखते हैं — सच्चे मन की पूजा सबको समान फल देती है।#गृहस्थ#संन्यासी#उपासना भेद
स्तोत्र लाभदारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र से गरीबी दूर होती है क्या?दारिद्र्य दहन='गरीबी जलाना'। शिव कृपा→धन, ऋण मुक्ति, शांति। सोमवार+प्रदोष, शिवलिंग। पर पाठ+मेहनत=सर्वश्रेष्ठ। केवल पाठ बिना कर्म=कठिन।#दारिद्र्य दहन#शिव#गरीबी
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर दूध चढ़ाने का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण क्या है?आध्यात्मिक: शिव ने हालाहल विष ग्रहण किया — दूध शीतल, ताप शांत करने का प्रतीक। पंचामृत अभिषेक का प्रमुख अंग। सत्त्वगुण, शुद्धता और अहंकार त्याग का प्रतीक। वैज्ञानिक: शिवलिंग की ऊर्जा का शीतल संतुलन। कच्चा गाय का दूध ही अर्पित करें।#दूध#शिवलिंग#अभिषेक
शिव पार्वती विवाहशिव और पार्वती के विवाह में सप्तपदी का क्या विधान था?शिव-पार्वती विवाह में ब्रह्मा पुरोहित बने। अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए गए जिसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्रतिज्ञाएं शामिल थीं। शिव ने वैदिक मंत्रों के साथ विवाह के सभी लोकाचार पूरे किए।#सप्तपदी#शिव पार्वती विवाह#विवाह विधि
शिव पूजा नियमशिव मंदिर में शिवलिंग का जलाभिषेक स्वयं कर सकते हैं या पुजारी से करवाएं?साधारण जलाभिषेक = स्वयं कर सकते हैं (शिव पुराण: सबका अधिकार)। रुद्राभिषेक/विशेष अनुष्ठान = पुजारी। बड़े मंदिर: गर्भगृह बंद — द्वार से या पुजारी। घर = स्वयं। दोनों शुभ।#जलाभिषेक#स्वयं#पुजारी
शिव महिमाशिव के माथे पर अर्धचंद्र क्यों होता है?शिव के माथे पर अर्धचंद्र इसलिए है क्योंकि उन्होंने दक्ष के श्राप से ग्रस्त चंद्रमा की रक्षा करके उन्हें अपने मस्तक पर स्थान दिया। समुद्र मंथन के हलाहल विष की गर्मी को शांत करने के लिए भी चंद्रमा को मस्तक पर धारण किया गया।#शिव चंद्रमा#अर्धचंद्र#चंद्रशेखर
शिव प्रतीकशिव की जटाओं में गंगा का वास होने का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?भगीरथ कथा: गंगा वेग से पृथ्वी रक्षा हेतु शिव ने जटाओं में धारण किया। आध्यात्मिक: गंगा = ज्ञान (नियंत्रित प्रवाह), सहस्रार चक्र का अमृत, शुद्धि शक्ति, करुणा (कठिनतम भार स्वयं धारण), नारी शक्ति का सर्वोच्च सम्मान।#गंगा#जटा#शिव
शिव पूजा विधिनर्मदेश्वर शिवलिंग की पूजा सामान्य शिवलिंग से कैसे अलग होती है?नर्मदेश्वर शिवलिंग (बाणलिंग) स्वयंभू है — प्राण प्रतिष्ठा अनावश्यक (शिव पुराण)। घर में 6 इंच तक स्थापित कर सकते हैं। हजारों सामान्य शिवलिंग पूजा का फल दर्शन मात्र से प्राप्त। सामान्य शिवलिंग में प्राण प्रतिष्ठा, विस्तृत विधि अनिवार्य। जलधारी का मुख उत्तर दिशा में रखें।#नर्मदेश्वर शिवलिंग#बाणलिंग#नर्मदा
शिव महिमाशिव जी रुद्राक्ष क्यों धारण करते हैं?शिव जी रुद्राक्ष इसलिए धारण करते हैं क्योंकि रुद्राक्ष उनके अपने नेत्रों के अश्रु से उत्पन्न उनका ही स्वरूप है। शिव पुराण के अनुसार रुद्राक्ष महापापों का नाशक, भक्ति का प्रतीक और लोककल्याणकारी है।#रुद्राक्ष#शिव#आत्मस्वरूप
शिव रूपशिव के पांच मुखों का नाम और दिशा क्या है?सद्योजात (पश्चिम/श्वेत/सृजन), वामदेव (उत्तर/लाल/पालन), अघोर (दक्षिण/नीला/संहार), तत्पुरुष (पूर्व/पीत/तिरोधान), ईशान (ऊर्ध्व/श्वेत/अनुग्रह)। तैत्तिरीय आरण्यक: पंचब्रह्म मंत्र। शिव की 5 क्रियाएं: सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान, अनुग्रह।#पंचमुखी#सद्योजात#वामदेव
दिव्यास्त्रत्रिपुरासुर कौन था और उसका वध कैसे हुआ?त्रिपुरासुर के तीन उड़ते हुए अजेय नगर थे जिन्हें शिव ने पाशुपतास्त्र से एक ही बाण में नष्ट किया। यह इस अस्त्र का सबसे प्राचीन ज्ञात प्रयोग है।#त्रिपुरासुर#पाशुपतास्त्र#शिव
दिव्यास्त्रभगवान शिव ने पाशुपतास्त्र से क्या किया?भगवान शिव ने पाशुपतास्त्र से त्रिपुरासुर का संहार किया और युगांत में सृष्टि का प्रलय करके नए सृजन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।#शिव#पाशुपतास्त्र#त्रिपुरासुर
दिव्यास्त्रभगवान शिव ने अर्जुन की परीक्षा कैसे ली?भगवान शिव ने किरात (शिकारी) का वेश धारण करके अर्जुन से युद्ध किया। इस कठिन परीक्षा में अर्जुन के पराक्रम और भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पाशुपतास्त्र दिया।#शिव#अर्जुन#किरात
दिव्यास्त्रअर्जुन को पाशुपतास्त्र कैसे मिला?अर्जुन ने इंद्रकील पर्वत पर कठोर तपस्या की। भगवान शिव ने किरात वेश में उनकी परीक्षा ली और संतुष्ट होकर पाशुपतास्त्र प्रदान किया।#अर्जुन#पाशुपतास्त्र#इंद्रकील
दिव्यास्त्रपाशुपतास्त्र कैसे मिलता था?पाशुपतास्त्र भगवान शिव की कठोर तपस्या, अटूट भक्ति और पूर्ण समर्पण से मिलता था। पात्रता के लिए शुद्ध हृदय और धर्मपरायण उद्देश्य जरूरी था।#पाशुपतास्त्र#प्राप्ति#तपस्या
दिव्यास्त्रपाशुपतास्त्र का नाम 'पाशुपत' क्यों पड़ा?पाशुपतास्त्र का नाम भगवान शिव के 'पशुपति' नाम से है जिसका अर्थ है 'सभी जीवों के स्वामी'। यह शिव के उस अस्त्र का प्रतीक है।#पाशुपतास्त्र#पशुपति#नाम अर्थ
दिव्यास्त्रपाशुपतास्त्र किसका अस्त्र है?पाशुपतास्त्र देवों के देव महादेव भगवान शिव का व्यक्तिगत और सर्वोच्च दिव्यास्त्र है।#पाशुपतास्त्र#शिव#महादेव
दिव्यास्त्रपाशुपतास्त्र क्या है?पाशुपतास्त्र भगवान शिव का सर्वाधिक शक्तिशाली दिव्यास्त्र है जो पलक झपकते ही संपूर्ण सृष्टि का विनाश करने में सक्षम है।#पाशुपतास्त्र#शिव#दिव्यास्त्र
शिव लीलाभस्मासुर ने शिव जी से क्या वरदान माँगा था?भस्मासुर ने शिव से वरदान माँगा कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रखे, वह तत्काल भस्म हो जाए। शिव ने 'एवमस्तु' कहकर दे दिया। वरदान पाते ही भस्मासुर ने शिव जी पर ही इसे आजमाने का दुस्साहस किया।#भस्मासुर वरदान#भस्म शक्ति#शिव वरदान
शिव महिमाशिव के पाँच मुखों के नाम क्या हैं?शिव के पाँच मुखों के नाम हैं — सद्योजात (पश्चिम), वामदेव (उत्तर), तत्पुरुष (पूर्व), अघोर (दक्षिण) और ईशान (ऊर्ध्व)। ये पाँच मुख क्रमशः पाँच दिशाओं और पाँच तत्वों के प्रतीक हैं।#शिव पंचमुख#पंचानन#सद्योजात
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर अभिषेक करते समय ॐ नमः शिवाय कितनी बार बोलना चाहिए?108 बार सर्वश्रेष्ठ (एक माला)। विशेष: 1008 बार (शिवरात्रि)। न्यूनतम: 11 बार। दैनिक: 21 बार पर्याप्त। मूल सिद्धांत: अभिषेक की धारा जब तक बहे, जप निरंतर करें — संख्या से अधिक भक्ति भाव महत्वपूर्ण। रुद्राक्ष माला से जप सर्वोत्तम।#ॐ नमः शिवाय#जप संख्या#108
शिव पार्वती विवाहशिव की बारात में कौन-कौन थे?शिव की बारात में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, सप्तर्षि, देवता, गंधर्व, यक्ष, नाग, किन्नर, गण, भूत-प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और समस्त जीव-जंतु शामिल थे। यह अब तक की सबसे विचित्र और अद्भुत बारात थी।#शिव बारात#शिव पार्वती विवाह#गण
दिव्यास्त्रमार्कण्डेय को यमदण्ड से कैसे बचाया गया?यमराज का पाश शिवलिंग पर पड़ने से क्रुद्ध होकर शिव महाकाल रूप में प्रकट हुए, यमराज को प्रहार से मूर्छित किया और मार्कण्डेय को अमरता का वरदान दिया।#मार्कण्डेय#यमदण्ड#शिव
दिव्यास्त्रमार्कण्डेय कौन थे और उनकी आयु केवल 16 वर्ष क्यों थी?मार्कण्डेय मृकण्डु ऋषि के पुत्र थे। उनके माता-पिता ने गुणवान अल्पायु पुत्र का वरदान चुना था, इसीलिए शिव के वरदान से उनकी आयु केवल 16 वर्ष निश्चित हुई।#मार्कण्डेय#मृकण्डु ऋषि#शिव
शिव पर्वश्रावण मास में सोमवार व्रत कैसे रखें, विधि सहित?सूर्योदय पूर्व स्नान → संकल्प → जलाभिषेक → पंचामृत → बेलपत्र → 108 जप → स्तोत्र → कर्पूर आरती। निराहार/फलाहार (अन्न-नमक वर्जित)। ब्रह्मचर्य। संध्या पूजा + कथा। सभी सोमवार व्रत — अधूरा अशुभ।#श्रावण सोमवार#व्रत#विधि
शिव महिमासती बिना बुलाए दक्ष के यज्ञ में क्यों गईं?सती बिना बुलाए इसलिए गईं क्योंकि पिता के घर के प्रति स्वाभाविक मोह था और उन्हें लगा कि पुत्री को निमंत्रण की आवश्यकता नहीं। शिव ने मना किया था, परंतु सती की पुत्री-भावना प्रबल रही और वे यज्ञ में पहुँच गईं।#सती दक्ष यज्ञ#सती#पिता का घर
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर आक के फूल चढ़ाने का क्या लाभ होता है?शिव पुराण: आक (मदार) चढ़ाने से मोक्ष प्राप्ति। सफेद आक सर्वश्रेष्ठ। लाभ: सांसारिक बाधा मुक्ति, नकारात्मकता नाश, गृह कलह शांति, ग्रह दोष शांति। सोमवार को विशेष। फूल ताजा और धोकर चढ़ाएं। आक विषैला — हाथ धोएं।#आक#मदार#अर्क
शिव अस्त्र-शस्त्रत्रिशूल के तीन बिंदुओं का क्या अर्थ है शिव पुराण मेंत्रिशूल के तीन शूल — तीन गुण (सत-रज-तम), तीन काल (भूत-भविष्य-वर्तमान), तीन ताप (दैहिक-दैविक-भौतिक) और तीन लोकों के अधिपति शिव की सर्वशक्तिमता के प्रतीक हैं।#त्रिशूल प्रतीक#तीन शूल अर्थ#सत्व रज तम
शिव अस्त्र-शस्त्रशिव पुराण में त्रिशूल के बारे में क्या लिखा हैशिव पुराण में त्रिशूल को शिव का सर्वाधिक अचूक शस्त्र बताया गया है। अंधकासुर, शंखचूड़, जलंधर जैसे दानवों का वध इससे हुआ। काशी शिव के त्रिशूल पर स्थित है।#त्रिशूल महिमा#शिव पुराण#अचूक अस्त्र
शिव अस्त्र-शस्त्रशिव जी के पास कहां से आया त्रिशूलशिव पुराण के अनुसार त्रिशूल शिव का स्वयंभू और नित्य शस्त्र है — इसके निर्माणकर्ता स्वयं शिव हैं। यह उनका अभिन्न शस्त्र है जो उन्होंने कभी किसी को नहीं दिया।#त्रिशूल उत्पत्ति#शिव स्वयंभू#दिव्य शस्त्र
शिव अस्त्र-शस्त्रचंद्रहास रावण को कैसे मिलीरावण ने कैलाश उठाने के बाद शिव के पैर से दबने पर दर्द में शिव तांडव स्तोत्र रचा। प्रसन्न शिव ने चंद्रहास खड्ग, अजेयता और 'रावण' नाम दिया — साथ में चेतावनी कि दुरुपयोग पर तलवार वापस आ जाएगी।#चंद्रहास#रावण#कैलाश