शिव पुराण परिचयवायवीय संहिता में किसका वर्णन हैवायवीय संहिता (4,000 श्लोक, 2 भाग) में वायु देव द्वारा प्रवचित शिव-तत्व का सर्वोच्च दार्शनिक विवेचन, पाशुपत दर्शन, माया-जीव-शिव का अद्वैत संबंध और मोक्ष मार्ग का वर्णन है।#वायवीय संहिता#वायु देव#शिव दर्शन
शिव पुराण परिचयकैलाश संहिता में क्या वर्णित हैकैलाश संहिता (6,000 श्लोक) में कैलाश धाम की महिमा, शिव का आदियोगी स्वरूप, योग-ध्यान-मोक्ष मार्ग, शिव के पंचमुख स्वरूप और शिव-तत्व का दार्शनिक विवेचन है।#कैलाश संहिता#योग#शिव तत्व
शिव पुराण परिचयउमा संहिता में किसका वर्णन हैउमा संहिता (8,000 श्लोक) में देवी पार्वती के अद्भुत चरित्र, शिव-पार्वती संवाद में आध्यात्मिक उपदेश, गृहस्थ धर्म और शिव-शक्ति की अभिन्नता का वर्णन है। उमा = पार्वती जो शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप का आधा भाग हैं।#उमा संहिता#पार्वती#अर्धनारीश्वर
शिव पुराण परिचयकोटिरुद्र संहिता में क्या हैकोटिरुद्र संहिता (9,000 श्लोक) में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों — सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारनाथ, भीमाशंकर, काशी विश्वनाथ, त्र्यंबकेश्वर, वैद्यनाथ, नागेश्वर, रामेश्वरम, घृष्णेश्वर — की उत्पत्ति और महिमा का वर्णन है।#कोटिरुद्र संहिता#ज्योतिर्लिंग#बारह ज्योतिर्लिंग
शिव पुराण परिचयरुद्र संहिता में कौन-कौन से खंड हैंरुद्र संहिता में 5 खंड हैं — 1. सृष्टि खंड (शिव-महात्म्य) 2. सती खंड (सती विवाह, दक्ष-यज्ञ) 3. पार्वती खंड (पार्वती तपस्या, शिव-विवाह) 4. कुमार खंड (कार्तिकेय जन्म) 5. युद्ध खंड (शंखचूड़ आदि वध)।#रुद्र संहिता#शिव पुराण#सती
शिव पुराण परिचयविद्येश्वर संहिता में क्या वर्णित हैविद्येश्वर संहिता (10,000 श्लोक) में शिवलिंग पूजा, शिवरात्रि व्रत, पंचकृत्य (सृष्टि-स्थिति-संहार-तिरोभाव-अनुग्रह), ओंकार महिमा, रुद्राक्ष-भस्म का महत्व और दान का वर्णन है।#विद्येश्वर संहिता#शिव पुराण#शिवलिंग पूजा
शिव पुराण परिचयशिव पुराण की कितनी संहिताएं हैं उनके नाम क्या हैंशिव पुराण में 7 संहिताएँ हैं — 1. विद्येश्वर 2. रुद्र 3. शतरुद्र 4. कोटिरुद्र 5. उमा 6. कैलाश 7. वायवीय। रुद्र संहिता के 5 खंड और वायवीय के 2 खंड होने से कुल 8 भाग माने जाते हैं।#शिव पुराण संहिता#सात संहिता#नाम सूची
शिव पुराण परिचयशिव पुराण किसने लिखा थाशिव पुराण की मूल रचना स्वयं भगवान शिव ने की। महर्षि व्यास ने इसे 24,000 श्लोकों में संक्षिप्त कर संकलित किया। सूतजी ने नैमिषारण्य में ऋषियों को इसे सुनाया।#शिव पुराण#व्यास#लेखक
शिव पुराण परिचयशिव पुराण में कुल कितने श्लोक हैंमूल शिव पुराण में एक लाख श्लोक थे। व्यासजी ने इसे संक्षिप्त कर 24,000 श्लोकों में प्रस्तुत किया — यही रूप आज उपलब्ध है।#शिव पुराण#श्लोक संख्या#पुराण परिचय
शिव पुराण परिचयशिव पुराण में कितनी संहिताएं हैंवर्तमान में प्रचलित शिव पुराण में 7 संहिताएँ हैं। मूल शिव पुराण में 12 संहिताएँ थीं जिन्हें व्यासजी ने संक्षिप्त किया।#शिव पुराण#संहिता#पुराण परिचय
शिव महिमाशिव जी का तीसरा नेत्र किस कारण खुलता है?शिव का तीसरा नेत्र तब खुलता है जब अधर्म, अहंकार या सृष्टि पर भयंकर संकट आता है। कामदेव द्वारा तपस्या भंग करने पर, सती के आत्मदाह पर और त्रिपुरासुर वध के समय यह नेत्र खुला। यह नेत्र संहार, विवेक और ज्ञान का प्रतीक है।#शिव तीसरा नेत्र#कामदेव दहन#संहार
शिव मंदिरमहाकालेश्वर भस्म आरती में श्मशान भस्म का उपयोग क्यों होता है?प्राचीन: श्मशान भस्म — शिव = श्मशानवासी, मृत्यु विजयी, वैराग्य संदेश। वर्तमान: श्मशान भस्म का उपयोग नहीं — कपिला गाय गोबर + 6 वृक्ष लकड़ी + कपूर-गुगल से तैयार। भस्म प्रकार: श्रौत, स्मार्त, लौकिक।#श्मशान भस्म#महाकालेश्वर#भस्म आरती
शिव मंत्रसंजीवनी मंत्र क्या है और इसका जप कैसे करें?संजीवनी मंत्र = महामृत्युंजय का नाम (मृत-संजीवनी)। मार्कंडेय ने मृत्यु जीती। 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...' ऋग्वेद 7.59.12। रुद्राक्ष माला, 108 नित्य, सोमवार। रोगी पास जप = लाभ। सवा लाख + हवन। शिवलिंग अभिषेक + जप।#संजीवनी#महामृत्युंजय#जीवनदायी
लोकनैमित्तिक प्रलय में सात सूर्यों का क्या काम है?प्रलय में सूर्य की सात रश्मियाँ सात प्रलयंकारी सूर्य बन जाती हैं जिनकी प्रचंड अग्नि से पहले भूलोक फिर भुवर्लोक और फिर स्वर्लोक भस्म हो जाते हैं।#सात सूर्य#नैमित्तिक प्रलय#भुवर्लोक
शिव महिमाशिव पुराण में भस्म का क्या महत्व बताया गया है?शिव पुराण में भस्म को शिव का साक्षात स्वरूप बताया गया है। इसे लगाने से पाप नष्ट होते हैं, जीवन की नश्वरता का बोध होता है और वैराग्य जागता है। ललाट पर तीन रेखाओं में लगाई जाने वाली त्रिपुंड्र भस्म आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।#भस्म महत्व#शिव पुराण#विभूति
शिव पूजा नियमशिव की पूजा में ग्रहण काल विशेष रूप से शुभ क्यों माना जाता है?ग्रहण = ब्रह्मांडीय ऊर्जा संकेंद्रण — जप 100-1000 गुना फल। शिव = राहु-केतु नियंत्रक। महामृत्युंजय जप सर्वोत्तम। ग्रहण स्पर्श→मोक्ष तक जप। ग्रहण बाद स्नान + दान।#ग्रहण#सूर्य ग्रहण#चंद्र ग्रहण
दिव्यास्त्रमेघनाद को अदृश्यता की शक्ति कहाँ से मिली?मेघनाद की अदृश्यता का स्रोत विवादित है — एक मत अंतर्धान अस्त्र को श्रेय देता है जबकि अन्य ग्रंथ माया, शिव-ब्रह्मा के वरदान और निकुंभिला यज्ञों को कारण मानते हैं।#मेघनाद#अदृश्यता#माया
दिव्यास्त्रभगवान शिव ने त्रिपुर विनाश में अंतर्धान अस्त्र का प्रयोग क्यों किया?शिव ने अंतर्धान अस्त्र से असुरों को निद्रा-चेतनाहीन किया ताकि वे रक्षा न कर सकें और पाशुपतास्त्र को अचूक अवसर मिले।#शिव#त्रिपुर#अंतर्धान अस्त्र
दिव्यास्त्रअंतर्धान अस्त्र का पहला ज्ञात प्रयोग कब और किसने किया?अंतर्धान अस्त्र का पहला ज्ञात प्रयोग स्वयं भगवान शिव ने त्रिपुर विनाश के समय किया था। इसका उल्लेख महाभारत के वन पर्व में मिलता है।#अंतर्धान अस्त्र#पहला प्रयोग#शिव
शिव पर्वश्रावण मास में प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाने का नियम क्या है?प्रातःकाल सर्वोत्तम। गंगाजल श्रेष्ठ, शुद्ध जल भी स्वीकार्य। तांबे/कांसे/मिट्टी के लोटे से (शंख वर्जित)। 'ॐ नमः शिवाय' जपते हुए। जलाधारी उत्तर दिशा। शिव पुराण: 'जलेन वृष्टिमाप्नोति' = धन प्राप्ति। केवल सोमवार नहीं, प्रतिदिन चढ़ाएं। निर्माल्य जल ग्रहण न करें।#श्रावण#जलाभिषेक#प्रतिदिन
शिव अवतारभैरव अवतार में शिव ने क्या किया?भैरव अवतार में शिव ने ब्रह्मा का अहंकारी पाँचवाँ सिर काटा, काशी का आधिपत्य लिया और ब्रह्म-हत्या के प्रायश्चित के लिए तीर्थाटन किया। काशी में उन्हें पाप-मुक्ति मिली और वे वहाँ के कोतवाल बने।#भैरव#ब्रह्मा सिर#काशी
शिव महिमासती ने यज्ञकुंड में आत्मदाह क्यों किया?सती ने यज्ञकुंड में आत्मदाह इसलिए किया क्योंकि उनके पिता दक्ष ने पति शिव का घोर अपमान किया और यज्ञ में उनके लिए भाग नहीं रखा। अपने पिता द्वारा पति की निंदा और अपने चारों ओर देवताओं की चुप्पी सती के लिए असह्य हो गई।#सती आत्मदाह#सती दक्ष यज्ञ#शिव पत्नी
शिव पूजा नियमशालिग्राम और शिवलिंग की एक साथ पूजा कर सकते हैं या नहीं?हां — स्मार्त/समन्वयवादी परंपरा में दोनों की एक साथ पूजा वैध। सामग्री भेद रखें: तुलसी = शालिग्राम, बेलपत्र = शिवलिंग। शंख = शालिग्राम, शिवलिंग पर वर्जित। शिवलिंग का निर्माल्य ग्रहण न करें, शालिग्राम का कर सकते हैं। कुछ सम्प्रदायों में भिन्न मत है।#शालिग्राम#शिवलिंग#विष्णु
शिव अस्त्र-शस्त्रत्रिशूल के तीन बिंदुओं का क्या अर्थ हैत्रिशूल के तीन बिंदु — त्रिगुण (सत्व-रज-तम), त्रिकाल (भूत-वर्तमान-भविष्य), त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश), त्रिताप (दैहिक-दैविक-भौतिक) और त्रिलोक (स्वर्ग-भूमि-पाताल) के प्रतीक हैं।#त्रिशूल अर्थ#तीन बिंदु#शिव दर्शन
शिव अस्त्र-शस्त्रत्रिशूल में तीन शिर क्यों होते हैंत्रिशूल के तीन शिर तीन गुण (सत्व-रज-तम), तीन काल (भूत-वर्तमान-भविष्य), तीन ताप (दैहिक-दैविक-भौतिक) और तीन लोकों पर शिव की सर्वाधिकार-शक्ति के प्रतीक हैं।#त्रिशूल तीन शिर#त्रिशूल प्रतीक#तीन गुण
दिव्यास्त्रपाशुपतास्त्र क्या होता हैपाशुपतास्त्र शिव का सर्वसंहारक दिव्यास्त्र है जो मन, नेत्र, वाणी या धनुष — किसी से भी चलाया जा सकता है। तीनों लोकों में कोई इससे नहीं बच सकता। कमजोर पर नहीं चलाना — वरना सृष्टि-नाश हो सकता है।#पाशुपतास्त्र#शिव#अकाट्य
दिव्यास्त्रशिव ने दुर्गा को त्रिशूल क्यों दियामहिषासुर-वध के लिए देवताओं ने देवी दुर्गा को अपने अस्त्र दिए। शिव ने अपने शूल से त्रिशूल निकालकर देवी को दिया। देवी ने इसी त्रिशूल से महिषासुर का वध किया — इसलिए उन्हें महिषासुरमर्दिनी कहते हैं।#शिव दुर्गा त्रिशूल#महिषासुर#देवी शक्ति
शिव साधनाशिव यंत्र स्थापित करने की विधि क्या है?सोमवार/शिवरात्रि। गंगाजल शुद्धि → 108 मंत्र जप → लाल/सफेद वस्त्र पर स्थापन → चंदन-अक्षत-फूल → दीपक-आरती। उत्तर/पूर्व दिशा। प्रतिदिन जल छिड़कें + दीपक + जप। खंडित हो तो विसर्जन।#शिव यंत्र#स्थापना#विधि
शिव रूपभैरव रूप में शिव की पूजा विधि क्या है?भैरव = शिव का उग्र 5वां अवतार, काशी के कोतवाल। कालाष्टमी (कृष्ण अष्टमी) मुख्य दिन। रात्रि पूजा। 'ॐ कालभैरवाय नमः' 108 बार। काले तिल, सरसों तेल, गेंदा। काले कुत्ते को भोजन। काशी में विश्वनाथ से पहले भैरव दर्शन अनिवार्य।#भैरव#अष्टभैरव#कालाष्टमी
शिव महिमातारकासुर के तीन पुत्रों ने ब्रह्माजी से क्या वरदान माँगा था?तीनों पुत्रों ने माँगा — सोने, चाँदी और लोहे के तीन उड़ते नगर। अभिजित नक्षत्र में एक सीध में आने पर किसी एक व्यक्ति का असंभव रथ से एक बाण में तीनों नष्ट करने पर ही मृत्यु हो। ब्रह्माजी ने यह वरदान दिया और मय दानव ने तीनों नगर बनाए।#त्रिपुरासुर वरदान#तीन नगर#अभिजित नक्षत्र
भक्ति एवं आध्यात्महर हर महादेव और ॐ नमः शिवाय में क्या अंतरॐ नमः शिवाय एक यजुर्वेद का पंचाक्षरी मंत्र है जिसे जप और साधना के लिए प्रयुक्त किया जाता है। हर हर महादेव एक जयघोष है जो शिव के दुखहर्ता और महान देव रूप की भक्तिमय घोषणा है।#हर हर महादेव#ॐ नमः शिवाय#शिव अभिवादन
शिव दर्शनशिव ने विष क्यों पिया और इसका आध्यात्मिक संदेश क्या है?सृष्टि रक्षा — कोई तैयार नहीं, शिव ने पिया। संदेश: परोपकार (दूसरों का दुःख स्वयं लिया), त्याग (अमृत दूसरों को), नकारात्मकता रोकें-फैलाएं नहीं, शिव+शक्ति = पूर्ण (पार्वती ने कंठ दबाया)। ज्ञान में स्थित = दुःख नष्ट नहीं करता।#हलाहल#विष#नीलकंठ
शिव महिमाशिव जी की जटाओं में गंगा कैसे आई?भगीरथ की तपस्या से गंगा धरती पर आने को तैयार हुई, लेकिन उनके प्रचंड वेग से पृथ्वी नष्ट हो जाती। भगीरथ ने शिव से विनती की। शिव ने जटाएं खोलकर गंगा को समेट लिया और उनका अहंकार चूर किया, फिर एक धारा भागीरथी के रूप में धरती पर उतारी।#गंगाधर#गंगा जटा#भगीरथ
दिव्यास्त्रनागपाश का निर्माण किसने किया था?कुछ कथाओं के अनुसार नागपाश का निर्माण स्वयं ब्रह्मा ने एक विशेष यज्ञ द्वारा किया था, जिसे बाद में उन्होंने महादेव को दे दिया था।#नागपाश#निर्माण#ब्रह्मा
दिव्यास्त्रमेघनाद को नागपाश कैसे मिला?मेघनाद ने विकट तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न करके नागपाश प्राप्त किया। साथ ही नागराज वासुकि की पुत्री से विवाह के कारण नागलोक की शक्ति भी उसे प्राप्त थी।#मेघनाद#इंद्रजीत#नागपाश
शिव दर्शनशिव को भोलेनाथ क्यों कहते हैं — इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है?भोला = सरल, निश्छल, शीघ्र प्रसन्न (आशुतोष)। एक लोटा जल = प्रसन्न। जाति-पद नहीं देखते। भस्मासुर/रावण को भी वरदान — करुणा। श्मशानवासी फिर भी शांत = अनासक्ति। गहन: अहंकार शून्य = परम ज्ञानी = भोलेनाथ।#भोलेनाथ#अर्थ#आध्यात्मिक
दिव्यास्त्रमाता सती के प्रसंग में सुदर्शन चक्र का क्या उपयोग हुआ?शिव के तांडव से सृष्टि को बचाने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को विच्छेदित किया जो पृथ्वी पर गिरकर शक्तिपीठ बन गए।#सुदर्शन चक्र#सती#शिव
दिव्यास्त्रभगवान शिव ने विष्णु को सुदर्शन चक्र क्यों दिया?असुरों के बढ़ते अत्याचार से देवताओं की रक्षा के लिए विष्णु ने कैलाश पर शिव की कठोर तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें सुदर्शन चक्र वरदान में दिया।#शिव#विष्णु#सुदर्शन चक्र
दिव्यास्त्रसुदर्शन चक्र कैसे बना?सुदर्शन चक्र की उत्पत्ति की तीन प्रमुख कथाएँ हैं — शिव ने विष्णु को दिया, विश्वकर्मा ने सूर्य के तेज से बनाया, और परशुराम ने श्रीकृष्ण को दिया।#सुदर्शन चक्र#उत्पत्ति#विश्वकर्मा
शिव पूजा विधिशिव के वाहन नंदी की पूजा कब और कैसे करें?शिव पूजा में शिवलिंग से पहले नंदी दर्शन अनिवार्य। सोमवार/शिवरात्रि/सावन विशेष। जल, अक्षत, फूल, चंदन अर्पित। 'ॐ नंदीश्वराय नमः' जपें। नंदी-शिवलिंग बीच से न गुजरें। नंदी = शिलाद पुत्र, शिव के द्वारपाल-वाहन-परम भक्त।#नंदी#वाहन#पूजा
गणेश कथाशिव ने गणेश जी को हाथी का सिर कैसे लगाया?शिव पुराण के अनुसार शिव जी ने गणों को उत्तर दिशा में भेजा। वहाँ माँ की तरफ पीठ करके सोते हुए हाथी के बच्चे का सिर लाया गया। शिव जी ने उसे गणेश के धड़ से जोड़कर मंत्रबल से प्राण डाले और गणेश जी पुनर्जीवित हुए।#गणेश हाथी सिर#शिव वरदान#गजमुख
शिव लीलागजासुर कौन था?गजासुर महिषासुर का पुत्र और हाथी जैसे रूप का शक्तिशाली दैत्य था। उसने ब्रह्मा की तपस्या से वरदान प्राप्त किया और तीनों लोकों में आतंक मचाया। वह शिव भक्त भी था और अंत में काशी में कृत्तिवासेश्वर ज्योतिर्लिंग बन गया।#गजासुर#महिषासुर पुत्र#हाथी दैत्य
तंत्र प्रतीकतंत्र में त्रिशूल का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?त्रिशूल = बहुस्तरीय प्रतीक। त्रिगुण (सत्व-रज-तम), त्रिकाल (भूत-वर्तमान-भविष्य), तीन नाड़ी (इडा-पिंगला-सुषुम्ना), तीन लोक, तीन शक्तियां (इच्छा-ज्ञान-क्रिया), तीन अवस्थाएं। शिव = सभी 'त्रय' के अधिपति और सबसे परे।#त्रिशूल#शिव#प्रतीक
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर जल चढ़ाते समय कौन सा मंत्र पढ़ना चाहिए?शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय प्रमुख मंत्र: 'ॐ नमः शिवाय' (सर्वसुलभ, शिव पुराण)। 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...' (महामृत्युंजय, यजुर्वेद)। 'ॐ तत्पुरुषाय विद्महे...' (रुद्र गायत्री)। तांबे के लोटे से, उत्तर दिशा में मुख करके, छोटी धारा में जल अर्पित करें।#जलाभिषेक#शिवलिंग#मंत्र
रुद्राभिषेकरुद्राभिषेक करवाने से पितृ दोष दूर होता है या नहीं?हां — रुद्राभिषेक पितृ दोष निवारण में अत्यंत प्रभावशाली (शिव पुराण/ज्योतिष शास्त्र)। विशेष: श्राद्ध पक्ष/अमावस्या पर कराएं। तिल मिश्रित जल + महामृत्युंजय मंत्र। कालसर्प, मंगल, शनि दोष भी दूर होते हैं। श्राद्ध/तर्पण भी साथ करें।#पितृ दोष#रुद्राभिषेक#कुंडली
शिव लीलागजासुर ने किसकी तपस्या करके वरदान पाया?गजासुर ने ब्रह्माजी की घोर तपस्या की और उनसे वरदान पाया कि कोई देवता, मानव या राक्षस उसे न मार सके और उसका शरीर अभेद्य हो। वरदान पाकर वह अजेय और उन्मत्त हो गया।#गजासुर तपस्या#ब्रह्मा वरदान#गजासुर
शिव पूजाशिव पूजा में प्रसाद स्वयं बनाना चाहिए या बाजार से ला सकते हैं?स्वयं बनाना सर्वोत्तम — शुद्धता, भक्ति भाव, शिव स्मरण सहित। बाजार से भी ला सकते हैं — शर्त: ताजा, शुद्ध, अशुद्ध न हो। अर्पण पूर्व जल छिड़ककर शुद्ध करें। बासी/जूठा सर्वथा वर्जित। फल, दूध, मिठाई बाजार से चलते हैं। अनुष्ठान में स्वयं बनाना अनिवार्य। मुख्य: शिव भाव देखते हैं।#प्रसाद#नैवेद्य#शुद्धता
शिव प्रतीकशिव के त्रिशूल के तीन शूलों का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?शिव पुराण: सृष्टि आरंभ में सत्व-रज-तम से त्रिशूल बना। विष्णु पुराण: विश्वकर्मा ने सूर्यांश से निर्माण किया। 7 अर्थ: त्रिगुण, त्रिकाल, त्रिदेव, त्रिलोक, तीन कष्ट (आधिदैविक-आधिभौतिक-आध्यात्मिक), तीन नाड़ियां (इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना), पवित्रता।#त्रिशूल#तीन शूल#सत्व रज तम
शिव पूजाशिव पूजा में पंचमुखी रुद्राक्ष धारण करने का क्या लाभ है?पंचमुखी रुद्राक्ष = कालाग्नि रुद्र स्वरूप, पंच तत्व/पंच देव प्रतीक। लाभ: महामृत्युंजय जप माला → अकाल मृत्यु रक्षा। मानसिक शांति, रक्तचाप नियंत्रण, स्मृति वृद्धि, नकारात्मकता नाश। धारण: सोमवार/शिवरात्रि, 'ॐ ह्रीं नमः' 108 बार जप कर धारण। कोई भी व्यक्ति धारण कर सकता है।#पंचमुखी रुद्राक्ष#रुद्राक्ष#कालाग्नि रुद्र
तंत्र प्रतीकतांत्रिक साधना में त्रिशूल का क्या उपयोग होता है?प्रतीक: त्रिगुण, त्रिकाल, 3 नाड़ी (इड़ा/पिंगला/सुषुम्ना), इच्छा/ज्ञान/क्रिया। उपयोग: रक्षा (स्थापना), यंत्र, हवन। अघोरी: शव साधना (गोपनीय)। नटराज = सृष्टि+संहार।#त्रिशूल#उपयोग#तांत्रिक