शिव-सती-पार्वती कथाहिमवान की पुत्री पार्वती ने शिव को पाने के लिए क्या कियापार्वती ने हिमालय के गौरी-शिखर पर 3,000 वर्ष कठोर तपस्या की — पहले फलाहार, फिर पत्ते और फिर कुछ नहीं (अपर्णा)। शिव-नाम जप, उपवास और पंचाग्नि साधना से शिव का आसन हिला।#पार्वती तपस्या#शिव प्राप्ति#कठोर तप
शिव-सती-पार्वती कथासती ने दूसरा जन्म किसके घर लियासती ने दूसरा जन्म हिमनरेश हिमवान और रानी मेना के घर पार्वती के रूप में लिया। पर्वतराज की पुत्री होने से 'पार्वती' नाम पड़ा। जन्म के समय नारदजी ने भविष्यवाणी की कि ये शिव की पत्नी बनेंगी।#पार्वती जन्म#हिमवान#मेना
शिव-सती-पार्वती कथाविष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े क्यों किएशिव के तांडव से सृष्टि में प्रलय का खतरा था। सृष्टि-रक्षा के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शव के 51 टुकड़े किए ताकि शिव की भटकन रुके। उन 51 स्थानों पर शक्तिपीठ बने।#विष्णु सुदर्शन चक्र#सती शव#प्रलय रक्षा
शिव-सती-पार्वती कथाशिव सती के शव को लेकर क्यों भटकते रहेसती की मृत्यु से शिव अत्यंत शोकग्रस्त हुए — सती के शव को कंधे पर उठाकर विरह में पागलों की तरह तांडव करते हुए भटकते रहे। यह शिव की परम प्रेम-वेदना का पौराणिक चित्रण है।#शिव तांडव#सती शव#विरह वेदना
शिव-सती-पार्वती कथा५१ शक्तिपीठों की उत्पत्ति कैसे हुईसती के शव को लेकर तांडव करते शिव से प्रलय का खतरा उत्पन्न हुआ। सृष्टि-रक्षा के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शव के 51 टुकड़े किए — जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुई।#51 शक्तिपीठ#सती शव#शक्ति पीठ उत्पत्ति
शिव-सती-पार्वती कथासती के शरीर के टुकड़े कितने और कहाँ-कहाँ गिरेदेवी पुराण के अनुसार विष्णु के सुदर्शन चक्र से सती के 51 टुकड़े हुए। 42 भारत में, 4 बांग्लादेश में, 2 नेपाल में और 1-1 श्रीलंका-पाकिस्तान-तिब्बत में गिरे — वहाँ 51 शक्तिपीठ स्थापित हुए।#सती शरीर टुकड़े#51 शक्तिपीठ#सती अंग
शिव-सती-पार्वती कथादक्ष के कटे सिर पर बकरे का सिर क्यों लगाया गयादक्ष का मूल सिर यज्ञाग्नि में जल गया था इसलिए बकरे का सिर लगाकर उन्हें जीवित किया गया। यह पशु-बुद्धि और अहंकार का प्रतीक है — जिस पशु-वृत्ति से दक्ष ने शिव का अपमान किया वही उनकी पहचान बन गई।#दक्ष बकरा सिर#दक्ष पुनर्जीवन#यज्ञ पूर्ण
शिव-सती-पार्वती कथाशिव ने दक्ष को मारने के बाद उन्हें वापस जीवित क्यों कियाब्रह्मा-विष्णु सहित समस्त देवताओं की विनय पर शिव ने क्रोध शांत किया। यज्ञ अधूरा रह गया था — अधूरे यज्ञ से सृष्टि को अशुभ होता, इसलिए दक्ष को पुनर्जीवित कर यज्ञ पूर्ण कराया गया।#दक्ष पुनर्जीवन#शिव क्षमा#यज्ञ पूर्ण
शिव-सती-पार्वती कथावीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ में क्या कियावीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को पूरी तरह नष्ट कर दिया, अपमानकर्ता देवताओं को दंडित किया और अंत में दक्ष का सिर काट दिया। भगवान विष्णु भी वीरभद्र की शक्ति देख अंतर्धान हो गए।#वीरभद्र#दक्ष यज्ञ विध्वंस#दक्ष सिर
शिव-सती-पार्वती कथावीरभद्र कौन है और उसकी उत्पत्ति कैसे हुईवीरभद्र शिव के पहले उग्र रुद्रावतार और गण हैं। सती के आत्मदाह के समाचार पर क्रोधित शिव ने जटा उखाड़कर पर्वत पर फेंकी — उससे आठ भुजाओं वाले विकराल वीरभद्र प्रकट हुए।#वीरभद्र#शिव अवतार#जटा
शिव-सती-पार्वती कथासती की मृत्यु का समाचार पाकर शिव ने क्या कियासती के आत्मदाह का समाचार पाकर शिव अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र और महाकाली को उत्पन्न किया और वीरभद्र को दक्ष यज्ञ का विध्वंस करने की आज्ञा दी।#सती मृत्यु#शिव क्रोध#वीरभद्र
शिव मंदिरसोमनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा का विशेष विधान क्या है?12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम। चंद्रदेव (सोम) ने शापमुक्ति हेतु शिव तपस्या कर स्वर्ण मंदिर बनवाया (शिव पुराण, ऋग्वेद)। अरब सागर तट पर — बाणस्तम्भ (दक्षिण ध्रुव तक अबाधित)। 3 दैनिक आरतियां। रुद्राभिषेक, सवालाक्ष बिल्व, नवग्रह जाप। त्रिवेणी संगम स्नान। कृष्ण देहत्याग स्थल।#सोमनाथ#ज्योतिर्लिंग#गुजरात
शिव महिमाशिव जी व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल क्यों पहनते हैं?शिव पुराण के अनुसार दारुकवन में ऋषियों ने क्रोध में बाघ उत्पन्न किया जो शिव को मारने आया, लेकिन शिव ने उसे क्षण भर में मार डाला और उसकी खाल अपने शरीर पर लपेट ली। यह अहंकार और वासना पर विजय का प्रतीक है।#व्याघ्र चर्म#बाघ की खाल#दारुकवन
लोकइलावृत वर्ष में भगवान शिव किसकी उपासना करते हैं और क्यों?इलावृत वर्ष में भगवान शिव चतुर्व्यूह के चतुर्थ अंश 'संकर्षण' की उपासना करते हैं। यह दर्शाता है कि शिव जी भी भगवान विष्णु के संहार-स्वरूप के उपासक हैं।#इलावृत वर्ष#भगवान शिव#संकर्षण
लोकअलकनंदा को भागीरथी क्यों कहते हैं?अलकनंदा को भागीरथी इसलिए कहते हैं क्योंकि महाराज भगीरथ की घोर तपस्या से यह पृथ्वी पर अवतरित हुई और भगीरथ के रथ का अनुसरण करती हुई भारतवर्ष में आई।#अलकनंदा#भागीरथी#भगीरथ
शिव महिमाशिव जी भस्म कहाँ से लाते हैं?शिव जी मुख्यतः चिताभस्म — मृत शरीर के जलने के बाद बची राख — धारण करते हैं, क्योंकि वे महाकाल और श्मशान के स्वामी हैं। भक्तों के लिए यज्ञाग्नि से बनी या गोमय से बनी भस्म का उपयोग किया जाता है।#शिव भस्म#चिताभस्म#महाकाल
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर पंचामृत अभिषेक का सही क्रम क्या होना चाहिए?पंचामृत अभिषेक क्रम: 1. गंगाजल/शुद्ध जल → 2. कच्चा दूध → 3. दही → 4. घी → 5. शहद → 6. शक्कर/मिश्री → 7. मिश्रित पंचामृत → 8. अंतिम शुद्ध जल स्नान। प्रत्येक द्रव्य के बाद शुद्ध जल से धोएं। अनुपात: दूध>दही>शक्कर>शहद>घी। शिवलिंग का चढ़ावा ग्रहण न करें।#पंचामृत#अभिषेक#क्रम
शिव पूजा विधिशिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कैसे होती है, विधि सहित?नर्मदेश्वर/स्वयंभू = प्राण प्रतिष्ठा अनावश्यक। मनुष्य निर्मित = अनिवार्य। विधि: शुभ मुहूर्त → भूमि शुद्धि → गणेश-नवग्रह पूजन → कलश स्थापना → वैदिक मंत्रों से प्राण आवाहन → षोडशोपचार पूजन → हवन → पूर्णाहुति। योग्य पुरोहित से ही कराएं। घर के लिए नर्मदेश्वर सर्वोत्तम विकल्प।#प्राण प्रतिष्ठा#शिवलिंग#स्थापना
दिव्यास्त्रनागपाश मेघनाद को किसने दिया थानागपाश मेघनाद को भगवान शिव की कृपा से वरदान में मिला था। यह ब्रह्मा-निर्मित अस्त्र था जिसे शिव ने मेघनाद की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर प्रदान किया था।#नागपाश दाता#मेघनाद#शिव
शिव भक्तिशिव की पूजा करने से मृत्यु भय दूर होता है क्या — सच है?हां — शास्त्रसम्मत। शिव = महाकाल (मृत्यु विजयी)। महामृत्युंजय मंत्र (ऋग्वेद) — मार्कण्डेय ने यम पर विजय पाई। भस्म = 'शरीर नश्वर, आत्मा अमर' — ज्ञान से भय समाप्त। शिव पूजा मानसिक मृत्यु भय दूर करती है।#मृत्यु भय#महामृत्युंजय#महाकाल
शिव रूपकाल भैरव की पूजा में मदिरा का अर्पण क्यों किया जाता है?काल भैरव = तामसिक देवता, वाम मार्गी तांत्रिक परंपरा। ब्रह्मा वध कथा (शिव पुराण) — उग्र स्वरूप को तामसिक भोग। उज्जैन मंदिर: मूर्ति मदिरा ग्रहण करती है — ~2000 बोतल/दिन, अनसुलझा रहस्य। प्रसाद नहीं लिया जाता। सामान्य शिव पूजा में मदिरा सर्वथा वर्जित।#काल भैरव#मदिरा#उज्जैन
शिव पूजा विधिसावन में शिव की संध्या पूजा की विशेष विधि क्या है?प्रदोष काल (सूर्यास्त ±1.5 घंटे)। जलाभिषेक → बेलपत्र → धूप-दीपक → रुद्राष्टक/चालीसा → आरती → भोग → कथा। स्कन्द पुराण: प्रदोष = शिव तांडव — सबसे प्रसन्न काल।#संध्या#सावन#प्रदोष
शिव दर्शनशिव के ईशान मुख की उपासना का क्या फल मिलता है?ईशान = ऊर्ध्व मुख, अनुग्रह (मोक्ष) शक्ति — पांच मुखों में सर्वोच्च। फल: मोक्ष, सर्वविद्या ('ईशानः सर्वविद्यानाम्'), गुरु कृपा, ग्रह शांति, आत्मशुद्धि। ईशान कोण में ध्यान।#ईशान#पंचमुखी#अनुग्रह
शिव महिमात्रिपुर संहार में शिव का दिव्य रथ कैसे बना था?पृथ्वी=रथ, सूर्य-चंद्र=पहिए, मेरु=धनुष, वासुकी=डोर, विष्णु=बाण, अग्नि=बाण की नोक, ब्रह्मा=सारथी। विष्णु वृषभ रूप में रथ में जुड़े। इस असंभव रथ पर सवार होकर शिव ने एक ही बाण से तीनों पुरों को भस्म किया।#त्रिपुर संहार#शिव दिव्य रथ#पृथ्वी रथ
शिव मंत्रशिव मंत्र जप पूर्ण होने पर उद्यापन कैसे करें?पुरश्चरण विधि: (1) जप पूर्ण करें (सवा लाख)। (2) दशांश हवन (12,500 आहुति, मंत्र+स्वाहा)। (3) हवन का दशांश तर्पण (1,250, मंत्र+तर्पयामि)। (4) तर्पण का दशांश मार्जन (125, कुश से जल छिड़कें)। (5) मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन/दान। पूर्णाहुति + क्षमा प्रार्थना से समापन करें।#उद्यापन#मंत्र पूर्णाहुति#पुरश्चरण
शिव महिमात्रिपुरासुर कौन थे और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?त्रिपुरासुर तारकासुर के तीन पुत्र थे — तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली। कार्तिकेय द्वारा तारकासुर के वध के बाद इन्होंने देवताओं से बदला लेने के लिए ब्रह्मा की कठोर तपस्या की और तीन आकाश-नगरों के स्वामी बनकर त्रिपुरासुर कहलाए।#त्रिपुरासुर#तारकासुर पुत्र#तारकाक्ष
शिव महिमाभगीरथ ने शिव जी से गंगा को क्यों माँगा था?भगीरथ ने शिव से गंगा इसलिए माँगी क्योंकि उनके पूर्वज — राजा सगर के साठ हजार पुत्र — कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे और उनकी मुक्ति गंगाजल से ही संभव थी। गंगा का प्रचंड वेग संभालने के लिए शिव की जटाओं की आवश्यकता थी।#भगीरथ#गंगा#सगर पुत्र मोक्ष
विष्णु अस्त्र शस्त्रसुदर्शन चक्र किसने बनाया था?शिव पुराण के अनुसार सुदर्शन चक्र भगवान शिव ने बनाया था। एक अन्य कथा में देवशिल्पी विश्वकर्मा ने सूर्य का तेज घटाकर बची धूल से पुष्पक विमान, त्रिशूल और सुदर्शन चक्र — तीन दिव्य वस्तुएं बनाईं।#सुदर्शन चक्र निर्माण#विश्वकर्मा#सूर्य तेज
शिव पूजा नियमशिवलिंग पर नारियल पानी चढ़ाने का क्या महत्व होता है?शिवलिंग पर नारियल पानी चढ़ाना वर्जित है। कारण: नारियल 'श्रीफल' = लक्ष्मी का स्वरूप (विष्णु-संबंधित)। शिवलिंग का चढ़ावा ग्रहण नहीं होता — नारियल पानी व्यर्थ होगा। साबुत नारियल शिव के समक्ष रख सकते हैं, पर नारियल पानी से अभिषेक कभी न करें। शिवलिंग पर चढ़ा नारियल प्रसाद में न लें।#नारियल पानी#शिवलिंग#निषेध
तंत्र सामग्रीतांत्रिक साधना में डमरू का क्या प्रयोग होता है?शिव वाद्य। 14 ध्वनि (माहेश्वर सूत्र) = संस्कृत → सृष्टि। शिव/भैरव/काली आवाहन। चक्र सक्रिय (कंपन)। नकारात्मकता नाश। नटराज: डमरू=सृष्टि+अग्नि=संहार। आकार = शिव-शक्ति मिलन।#डमरू#प्रयोग#शिव
शिव परंपरानंदी के कान में मनोकामना कहने की परंपरा का शास्त्रीय आधार क्या है?शास्त्रीय ग्रंथों में स्पष्ट वर्णन नहीं — लोक परंपरा आधारित। प्रचलित मान्यता: शिव ने नंदी को वरदान दिया कि कान में कही मनोकामना शिव तक पहुंचेगी। नंदी = शिव के संदेशवाहक/द्वारपाल। नियम: पहले 'ॐ' बोलें, मुंह ढंकें, धीमे स्वर में। किस कान में — मतभेद (बायां/दाहिना)।#नंदी#कान#मनोकामना
शिव पूजा नियमशिवलिंग को स्पर्श करना चाहिए या नहीं, शास्त्रों में क्या कहा गया है?शास्त्रों के अनुसार: शिवलिंग का शीर्ष (रुद्र) भाग सीधे स्पर्श न करें। पुरुष स्नान के बाद स्पर्श कर सकते हैं। महिलाओं के लिए सीधा स्पर्श अनेक परंपराओं में वर्जित — 'नंदी मुद्रा' का विकल्प है। अविवाहित कन्याओं के लिए विशेष मनाही। मासिक धर्म में स्पर्श सर्वथा वर्जित। विषय पर मतभेद विद्यमान हैं।#स्पर्श#शिवलिंग#नियम
शिव पूजा नियमशिवलिंग पर हल्दी क्यों नहीं चढ़ाई जाती, इसका कारण बताएं?शिवलिंग पर हल्दी वर्जित। कारण: हल्दी = स्त्री सौभाग्य/सौंदर्य प्रतीक, शिव = वैरागी। हल्दी = विष्णु/बृहस्पति से संबंधित (पीतांबर)। रसोई सामग्री, शिव श्मशानवासी। शिवलिंग पर चंदन, भस्म या केसर लगाएं। पार्वती प्रतिमा पर हल्दी स्वीकार्य।#हल्दी#शिवलिंग#निषेध
शिव पूजा विधिशिव की पूजा में प्रदोष काल और निशीथ काल में क्या अंतर है?प्रदोष: संध्या (सूर्यास्त ±1.5 घंटे) — शिव तांडव, त्रयोदशी व्रत, नियमित। निशीथ: मध्यरात्रि (~12-1 AM) — महाशिवरात्रि मुख्य पूजा, निराकार दर्शन, गहन साधना। प्रदोष = सरल/मासिक; निशीथ = गहन/वार्षिक।#प्रदोष#निशीथ#काल
शिव अवतारशिव पुराण में शिव के कितने अवतार बताए गए हैं?शिव पुराण में भगवान शिव के 19 प्रमुख अवतार बताए गए हैं — वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, अश्वत्थामा, शरभ, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, ब्रह्मचारी, सुनटनर्तक और यक्ष।#शिव अवतार#शिव पुराण#19 अवतार
शिव पूजा नियमशिवलिंग से बहकर आया जल पीना चाहिए या नहीं?शिवलिंग का अभिषेक जल (निर्माल्य) ग्रहण करना शिव पुराण/लिंग पुराण में वर्जित है। कारण: शिव-शक्ति की तीव्र ऊर्जा, सोमसूत्र की पवित्रता। अन्य देवताओं का चढ़ावा ग्रहण होता है, शिवलिंग का नहीं — यह विशिष्ट नियम है। शिव मूर्ति का चरणामृत स्वीकार्य (भिन्न नियम)। अभिषेक जल पौधों में डालें।#चरणामृत#शिवलिंग जल#निर्माल्य
शिव मंत्रशिव मंत्र जप के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन क्यों आवश्यक है?ब्रह्मचर्य से ओज संचय → मंत्र शक्ति वृद्धि। मन एकाग्र रहता है। शिव स्वयं परम योगी — उनकी साधना में वैराग्य अनुकूल। पुरश्चरण विधि में ब्रह्मचर्य अनिवार्य नियम। नाड़ी शुद्धि, चक्र जागृति में सहायक। गृहस्थ साधक: पूर्ण ब्रह्मचर्य अनिवार्य नहीं, संयम और सात्विकता पर्याप्त।#ब्रह्मचर्य#साधना नियम#ओज
शिव स्तोत्रशिव तांडव स्तोत्र का पाठ किस समय करना सबसे प्रभावी है?सर्वोत्तम: प्रदोष काल (संध्या) — शिव स्वयं तांडव करते हैं। महाशिवरात्रि रात्रि, सावन सोमवार, सोम प्रदोष पर विशेष। शुद्ध उच्चारण अनिवार्य। लाभ: शत्रु नाश, आत्मबल, कानूनी विजय, नकारात्मकता रक्षा। दैनिक 1-3-11 बार।#शिव तांडव#रावण#स्तोत्र
शिव पूजा विधिशिवलिंग पर काले तिल चढ़ाने का क्या प्रभाव होता है?तिल = पापनाशक (शिव पुराण)। काले तिल विवादित: कुछ परंपरा में वर्जित (विष्णु संबंध), कुछ में शुभ (शनि दोष निवारण, कालसर्प दोष)। सफेद तिल सर्वमान्य शुभ। काले तिल चढ़ाने हेतु कुलपुरोहित से परामर्श लें।#काले तिल#शिवलिंग#शनि
शिव महिमाहलाहल विष पीने से शिव का गला नीला क्यों पड़ गया?हलाहल की अत्यंत तीव्र विषाक्तता और उष्मा के प्रभाव से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया। माता पार्वती ने गला दबाकर विष को नीचे उतरने से रोका था इसलिए वह कंठ में ही स्थिर रहा और नीला पड़ा। तभी से शिव 'नीलकंठ' कहलाए।#नीलकंठ#हलाहल प्रभाव#शिव गला नीला
शिव नाम महिमाशिव को शंभू क्यों कहते हैंशंभू = 'शं' (शुभ, कल्याण) + 'भू' (स्वरूप) = आनंद-स्वरूप, कल्याण के साकार रूप। शिव स्वयं परमानंद हैं और भक्तों को भी आनंद देते हैं — इसीलिए 'शंभू'। वे अनंत, अनादि और सृष्टि के संचालक हैं।#शंभू#आनंद स्वरूप#कल्याण
शिव नाम महिमाशिव को उमापति क्यों कहते हैंउमापति = उमा (पार्वती) के पति। 'उमा' नाम उनकी माँ द्वारा 'उ! मा!' कहने से पड़ा। यह नाम शिव के गृहस्थ, प्रेमपूर्ण और परम-भक्त-वत्सल स्वरूप को दर्शाता है। एक ओर महायोगी, दूसरी ओर उमा के परम प्रेमी।#उमापति#पार्वती पति#शिव नाम
शिव नाम महिमाशिव को रुद्र क्यों कहते हैंरुद्र = 'रुत्' (दुख) + 'द्र' (हरने वाला) — दुखों को हरने वाले देव। यह शिव का वेदों में मूल नाम है। यजुर्वेद के रुद्रम् में 'नमस्ते रुद्र मन्यव' से इनका स्तवन है। रुद्र सौम्य और उग्र — दोनों स्वरूपों में विराजते हैं।#रुद्र#दुख हरण#वेद नाम
शिव नाम महिमाशिव को आशुतोष क्यों कहते हैंआशुतोष = शीघ्र प्रसन्न होने वाले। एक बेलपत्र, एक लोटा जल — इतने से संतुष्ट हो जाते हैं। रावण-भस्मासुर जैसों को भी वरदान दिया। 'ॐ आशुतोषाय नमः' इनकी शीघ्र कृपा के लिए मंत्र है।#आशुतोष#शीघ्र प्रसन्न#भक्त वत्सल
शिव नाम महिमाशिव को पशुपति क्यों कहते हैंपशुपति = जीवात्माओं के स्वामी। 'पशु' = माया-बंधन में जकड़ी आत्मा, 'पति' = उस बंधन से मुक्त कराने वाले स्वामी। शिव समस्त जीव-जगत और बद्ध आत्माओं के रक्षक-मुक्तिदाता हैं। यजुर्वेद के रुद्रम् में इसका उल्लेख है।#पशुपति#पशुपतिनाथ#जीव स्वामी
शिव नाम महिमाशिव को त्रिलोचन क्यों कहते हैंत्रिलोचन = तीन नेत्रों वाले। दायाँ = सूर्य, बायाँ = चंद्र, तृतीय = अग्नि (दिव्य ज्ञान)। तृतीय नेत्र घोर अधर्म पर खुलता है — कामदेव को भस्म किया। यह आज्ञा-चक्र और परम ज्ञान का प्रतीक है।#त्रिलोचन#तीसरा नेत्र#तृतीय नयन
शिव नाम महिमाशिव को महाकाल क्यों कहा जाता हैमहाकाल = समय के महान अधिपति। शिव समस्त काल-चक्र के स्वामी हैं — जन्म से मृत्यु तक सब उनके अधीन है। वे मृत्युंजय भी हैं — मृत्यु को भी जीतने वाले। उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग इसी रूप का प्रतीक है।#महाकाल#काल#समय
शिव नाम महिमाशिव को भोलेनाथ क्यों कहते हैंभोलेनाथ = सरल, निष्कपट और सहजता से प्रसन्न होने वाले प्रभु। एक लोटा जल और बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं। रावण-भस्मासुर जैसे असुरों को भी वरदान दिया। यही उनकी भोली प्रकृति है।#भोलेनाथ#आशुतोष#शिव सरलता
शिव नाम महिमाशिव को नीलकंठ क्यों कहते हैंसमुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को शिव ने संसार की रक्षा के लिए पी लिया। पार्वती ने कंठ पकड़ा जिससे विष नीचे नहीं उतरा — कंठ नीला हो गया। इसीलिए शिव 'नीलकंठ' कहलाए।#नीलकंठ#समुद्र मंथन#हलाहल विष
शिव नाम महिमाभगवान शिव को महादेव क्यों कहा जाता हैमहादेव = 'महान देव' — सभी देवताओं में श्रेष्ठ। शिव संहार के अधिपति हैं जो सृष्टि का सबसे शक्तिशाली कार्य है। सभी से समदृष्टि रखते हैं — देव, दानव, साधु, भक्त — सब पर समान कृपा। इसीलिए वे 'देवों के देव महादेव' हैं।#महादेव#शिव नाम#देवाधिदेव