विस्तृत उत्तर
पार्वती बचपन से ही शिवभक्त थीं और उनका एकमात्र संकल्प था — भगवान शिव को पति रूप में पाना। माता-पिता के मना करने के बावजूद वे हिमालय के उस शिखर पर तपस्या के लिए चली गईं जो बाद में 'गौरी-शिखर' कहलाया।
कठोर तपस्या — शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने पहले वर्ष फलाहार से, दूसरे वर्ष पर्ण (पत्ते) खाकर जीवन व्यतीत किया। फिर पर्ण का भी त्याग कर दिया — इसीलिए वे 'अपर्णा' कहलाईं। सूखकर गिरे हुए बेलपत्र का 3,000 वर्ष तक सेवन करते हुए उन्होंने घोर तप किया।
तपस्या की कठोरता — ग्रीष्म में पंचाग्नि के बीच, शीत में जल में खड़े होकर, वर्षा में खुले आकाश के नीचे — इस प्रकार त्रिकाल साधना की। उनकी कठोर तपस्या देखकर ऋषि-मुनि भी दंग रह गए।
परिणाम — अंततः शिव का आसन हिला। उन्होंने पहले सप्तर्षियों को पार्वती की परीक्षा लेने भेजा और फिर स्वयं ब्रह्मचारी वेश में परीक्षा लेने पहुँचे।
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