विस्तृत उत्तर
अम्बरीष की नवधा भक्ति का अर्थ है कि उन्होंने भक्ति को जीवन के हर अंग में उतार दिया था। वे केवल मन से भगवान को याद नहीं करते थे, बल्कि अपनी हर इंद्रिय को भगवान की सेवा में लगाते थे। उनका मन भगवान के चरणों में, वाणी हरिनाम में, कान हरिकथा में, हाथ मंदिर-सेवा में, आँखें भगवान के दर्शन में और पाँव तीर्थ-यात्रा में लगे रहते थे। यह भक्ति केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि पूर्ण आत्मसमर्पण थी। इसलिए अम्बरीष को आत्मनिवेदी भक्त कहा जाता है। उनकी भक्ति ने सिद्ध किया कि राजा होकर भी मनुष्य परम भक्त बन सकता है।
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