विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत में राजा अम्बरीष का वर्णन इस रूप में आता है कि उन्होंने अपना मन भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में लगाया। इसका अर्थ केवल ध्यान करना नहीं, बल्कि अपनी चेतना को संसार के आकर्षण से हटाकर भगवान में स्थिर कर देना है। राजा होते हुए भी उनका मन राज्य, धन, परिवार या विजय के मद में नहीं फँसा। वे सब कुछ भगवान की सेवा का साधन मानते थे। मन भगवान में लगने के कारण ही वे दुर्वासा के क्रोध, कृत्या के आक्रमण और सुदर्शन चक्र की लीला के समय भी विचलित नहीं हुए।
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