विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत महापुराण (5.24.15) में इस प्रसंग का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन है। भागवत कहता है — यस्मिन् प्रविष्टेऽसुरवधूनां प्रायः पुंसवनानि भयादेव स्रवन्ति पतन्ति च। इसका अर्थ है कि जब कभी सुदर्शन चक्र भगवान के तेज के रूप में इन अधोलोकों में प्रवेश करता है या उसकी परिक्रमा की ध्वनि गूंजती है तो उस अकल्पनीय भय के कारण असुरों और दानवों की गर्भवती स्त्रियों के गर्भपात हो जाते हैं और उनके गर्भ भय के मारे स्वतः ही गिर जाते हैं। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि चाहे अतल लोक का असुर बल कितनी ही माया रच ले और हाटक रस पीकर पुरुष स्वयं को ईश्वर क्यों न मान ले परंतु परमेश्वर की सर्वोच्च शक्ति सुदर्शन चक्र के समक्ष उनका संपूर्ण अहंकार और बल क्षण भर में धराशायी हो जाता है।
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