विस्तृत उत्तर
भगवान भक्त के अधीन शक्ति से नहीं, प्रेम से होते हैं। भक्त जब अपना मन, वाणी, कर्म, धन, परिवार और अहंकार सब भगवान को समर्पित कर देता है, तब भगवान भी उसे अपना मान लेते हैं। राजा अम्बरीष इसका महान उदाहरण हैं। उन्होंने अपने राज्य और वैभव को भी भगवान की सेवा में लगाया। जब दुर्वासा ने उनका अनिष्ट चाहा, तो भगवान का सुदर्शन चक्र स्वयं रक्षा के लिए आया। वैकुण्ठ में भगवान ने दुर्वासा से कहा कि वे अपने भक्तों के अधीन हैं। इसका अर्थ है कि शुद्ध भक्ति भगवान के हृदय को बाँध लेती है।
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