विस्तृत उत्तर
हाँ, गृहस्थ जीवन में भी मोक्ष पूर्णतः संभव है — यह सनातन शास्त्रों का स्पष्ट मत है। गृहस्थाश्रम को 'प्रवृत्ति मार्ग' कहा जाता है, जिसमें सांसारिक जिम्मेदारियाँ निभाते हुए मुक्ति प्राप्त की जाती है।
राजा जनक का उदाहरण सबसे प्रसिद्ध है। वे मिथिला के राजा थे, गृहस्थ थे, शासन चलाते थे — फिर भी उन्हें 'विदेह' कहा गया क्योंकि वे शरीर और संसार में रहते हुए भी उनसे अनासक्त थे। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जनक का उदाहरण देते हुए कर्म योग की महिमा बताई है।
गीता (18.30) में स्पष्ट कहा गया है कि जो बुद्धि 'प्रवृत्ति मार्ग' और 'निवृत्ति मार्ग' को जानती है, वह सात्त्विकी है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करना, ईश्वर को सब कुछ समर्पित करना — यही प्रवृत्ति मार्ग से मुक्ति है।
गृहस्थ जीवन अपने आप में एक बड़ी साधना है। परिवार की जिम्मेदारियों, आर्थिक दबाव और सामाजिक रिश्तों के बीच भजन-स्मरण करना कठिन है, इसीलिए गृहस्थ की साधना संत परंपरा में अत्यंत सराहनीय मानी गई है।
संन्यास केवल उनके लिए है जिनकी प्रकृति और स्वभाव उस दिशा में है। शास्त्रों ने दोनों मार्गों को मोक्ष का साधन माना है — कोई एक श्रेष्ठ और दूसरा हीन नहीं।





