विस्तृत उत्तर
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय चेतना की अवस्थाएँ हैं। जाग्रत अवस्था में जीव इंद्रियों से बाहरी जगत अनुभव करता है। स्वप्न अवस्था में बाहरी इंद्रियाँ शांत रहती हैं, पर मन अपने संस्कारों से नई दुनिया बना लेता है। सुषुप्ति गहरी नींद है, जहाँ न बाहरी अनुभव रहता है न स्वप्न, पर अज्ञान बना रहता है। तुरीय इन तीनों से परे शुद्ध साक्षी चेतना है। हंस गीता में भगवान बताते हैं कि आत्मा वास्तव में तुरीय है। जो साधक स्वयं को इन अवस्थाओं का साक्षी जान लेता है, वह मन और माया से ऊपर उठता है।
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