विस्तृत उत्तर
जालंधर को शिव ही इसलिए मार सकते थे क्योंकि उसका जन्म शिव की क्रोधाग्नि से हुआ था। ब्रह्मा जी ने भी उसके जन्म के समय कहा था कि वह अत्यंत अजेय होगा और उसका अंत केवल महादेव के हाथों संभव होगा। दार्शनिक रूप से इसका अर्थ यह है कि जो शक्ति शिव से निकली है, उसका अंतिम विलय भी शिव में ही होगा। जालंधर का बाहरी रूप असुर का था, पर उसके भीतर शिव-तेज का अंश था। इसलिए देवता या विष्णु उसे स्थायी रूप से नष्ट नहीं कर सकते थे। वृंदा का कवच टूटने के बाद शिव ने उसका वध किया और उसका तेज शिव में मिल गया।
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