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विस्तृत उत्तर
कूर्मावतार को भगवान विष्णु के दशावतारों में दूसरा अवतार माना जाता है। पहला अवतार मत्स्य माना जाता है और उसके बाद कूर्म यानी कच्छप अवतार आता है। इस अवतार में विष्णु ने समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया था। कूर्मावतार का उद्देश्य अमृत प्राप्ति के लिए हो रहे मंथन को आधार देना और सृष्टि के संतुलन की रक्षा करना था। यह अवतार दिखाता है कि भगवान केवल युद्ध करके ही नहीं, बल्कि मौन आधार बनकर भी जगत का कल्याण करते हैं।
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