विस्तृत उत्तर
श्रीराम-लक्ष्मण जनकपुर में विश्वामित्रजी के साथ राजा जनक के अतिथि बने। राजा जनक ने विश्वामित्रजी और दोनों राजकुमारों का बड़ा आदर-सत्कार किया।
जनक ने चारों पुत्रों को मुनि के चरणों पर डाला, भोजन करवाया और उत्तम आवास की व्यवस्था की।
जनकपुर की स्त्रियों और नगरवासियों ने श्रीराम-लक्ष्मण को देखकर अत्यन्त आनन्दित हो गये और उनकी शोभा का वर्णन करने लगे। इसके बाद पुष्पवाटिका प्रसंग, सीता-राम का प्रथम मिलन, और फिर धनुष-भंग की कथा आती है।





