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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 2 मिनट पठन

सतीजी को शिवजी के प्रणाम करने पर क्या संदेह हुआ?

सतीजी को दो संदेह हुए — (1) सर्वव्यापक, मायारहित परब्रह्म मनुष्य कैसे बन सकता है? (2) सर्वज्ञ भगवान अज्ञानी की तरह पत्नी को क्यों खोजेंगे?

संक्षिप्त उत्तर

सतीजी को दो संदेह हुए — (1) सर्वव्यापक, मायारहित परब्रह्म मनुष्य कैसे बन सकता है? (2) सर्वज्ञ भगवान अज्ञानी की तरह पत्नी को क्यों खोजेंगे? उन्हें लगा कि शिवजी ने साधारण राजपुत्र को व्यर्थ प्रणाम किया।

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विस्तृत उत्तर

सतीजी को संदेह हुआ कि शिवजी ने एक साधारण-से दिखने वाले वनवासी राजपुत्र को प्रणाम क्यों किया, जो अपनी पत्नी के वियोग में दुखी होकर जंगल में भटक रहा है। क्या वही सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा परब्रह्म हो सकते हैं?

दोहा — 'ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद। सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥'

इसका अर्थ — जो ब्रह्म सर्वव्यापक, मायारहित, अजन्मा, अगोचर, इच्छारहित और भेदरहित है, और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है?

आगे — 'बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी। खोजइ सो कि अग्य इव नारी॥'

अर्थ — देवताओंके हितके लिये मनुष्यशरीर धारण करनेवाले जो विष्णुभगवान् हैं, वे भी शिवजीकी ही भाँति सर्वज्ञ हैं। वे ज्ञानके भण्डार, लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु क्या अज्ञानीकी तरह स्त्रीको खोजेंगे?

इस प्रकार सतीजी के मन में दो संदेह थे — (1) परब्रह्म मनुष्य कैसे बन सकता है, (2) सर्वज्ञ भगवान अज्ञानी की तरह पत्नी को क्यों खोजेंगे।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

सतीजी को शिवजी के प्रणाम करने पर क्या संदेह हुआ को संदर्भ सहित समझें

सतीजी को शिवजी के प्रणाम करने पर क्या संदेह हुआ का सबसे सीधा सार यह है: सतीजी को दो संदेह हुए — (1) सर्वव्यापक, मायारहित परब्रह्म मनुष्य कैसे बन सकता है? (2) सर्वज्ञ भगवान अज्ञानी की तरह पत्नी को क्यों खोजेंगे? उन्हें लगा कि...

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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