विस्तृत उत्तर
स्वर्ग और मोक्ष — दोनों मृत्यु के बाद की श्रेष्ठ गतियाँ हैं, किंतु दोनों में मूलभूत अंतर है।
स्वर्ग — शास्त्रों के अनुसार स्वर्ग एक लोक है जहाँ पुण्य कर्मों के फलस्वरूप जीव सुख भोगता है। किंतु यह सुख स्थायी नहीं है। जब तक पुण्य कर्मों का फल बाकी रहता है, तब तक स्वर्ग में रहना होता है; पुण्य समाप्त होते ही जीव पुनः पृथ्वी लोक में जन्म लेता है। गीता (9.21) में श्रीकृष्ण कहते हैं — 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' — पुण्य क्षीण होने पर मनुष्य लोक में आना पड़ता है।
मोक्ष — मोक्ष जन्म-मरण के संपूर्ण चक्र से मुक्ति है। यह कोई लोक या स्थान नहीं, बल्कि चेतना की वह परम अवस्था है जहाँ आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेती है, भय और इच्छा से मुक्त हो जाती है, और फिर कभी जन्म नहीं लेती।
मुख्य अंतर — स्वर्ग अस्थायी है, मोक्ष शाश्वत है। स्वर्ग में पुण्य का फल भोगा जाता है, मोक्ष में कर्मफल का चक्र ही समाप्त हो जाता है। स्वर्ग में अभी भी द्वैत और इच्छाएँ बनी रहती हैं; मोक्ष में सब मिट जाता है।
सनातन दर्शन में मोक्ष को स्वर्ग से भी उच्च माना गया है। पुरुषार्थ चतुष्टय में मोक्ष सर्वोच्च है। इसीलिए मनीषियों ने स्वर्ग की कामना को भी त्यागने और केवल मोक्ष की ओर चलने का उपदेश दिया है।





