विस्तृत उत्तर
तन्त्रोक्त रात्रिसूक्त देवी माहात्म्य के प्रथम अध्याय में आने वाली वह स्तुति है जिसे ब्रह्मा जी ने महामाया योगनिद्रा की प्रार्थना में कहा। इसमें देवी को स्वाहा, स्वधा, वषट्कार, सुधा, सावित्री और जगत की परम जननी कहा गया है। ब्रह्मा जी इस स्तुति द्वारा बताते हैं कि देवी ही सृष्टि को धारण, उत्पन्न, पालन और संहार करती हैं। मधु कैटभ कथा में यह स्तुति अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी के बाद देवी विष्णु के शरीर से प्रकट होकर उन्हें योगनिद्रा से जगाती हैं। इसलिए यह स्तुति शक्ति, सृष्टि और रक्षा का महत्त्वपूर्ण वैदिक-तांत्रिक सूत्र मानी जाती है।
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