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विस्तृत उत्तर
तपोलोक को परम पवित्र लोक माना जाता है क्योंकि यह भौतिक प्रपंचों, क्लेशों और त्रिगुणमयी माया, अर्थात सत्त्व, रज और तम, के बंधनों से पूर्णतः मुक्त है। यह एक विशुद्ध सात्त्विक और चिन्मय लोक है, जहाँ जन्म-मरण के लौकिक नियम लागू नहीं होते। यहाँ रहने वाले वैराज देवगण, सिद्ध तपस्वी और योगी संसार की तृष्णा, विषय-भोग की लालसा, धन की कामना, पद की इच्छा और ऐंद्रिक सुखों से मुक्त होकर ब्रह्म-ध्यान, ईश्वर-चिंतन और समाधि में स्थित रहते हैं।
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