विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत के भाव के अनुसार भगवान विष्णु अपने प्रिय भक्त का धन कभी-कभी इसलिए हर लेते हैं ताकि उसकी आसक्ति टूटे। मनुष्य धन, परिवार, प्रतिष्ठा और संबंधों को अपना अंतिम सहारा मानने लगता है। जब भगवान विशेष कृपा करते हैं, तो वे इन बाहरी सहारों को धीरे-धीरे कम कर सकते हैं। इससे भक्त संसार से निराश होकर नहीं, बल्कि जागकर भगवान की शरण में आता है। यह प्रक्रिया कठिन लग सकती है, पर उसका उद्देश्य मोक्ष और अनन्य भक्ति है। इसलिए विष्णु की यह कृपा बाहरी दृष्टि से हानि जैसी दिखती है, पर भीतर से आत्मा का कल्याण करती है।
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